नई दिल्ली :- भारत एक ऐसा देश है जहां हर त्योहार अलग रूप और अलग स्वाद के साथ मनाया जाता है। मकर संक्रांति इसका सबसे सुंदर उदाहरण है। जनवरी के महीने में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ यह पर्व मनाया जाता है जो प्रकृति बदलाव और फसलों की कटाई का प्रतीक माना जाता है। हालांकि मकर संक्रांति एक ही दिन आती है लेकिन देश के अलग अलग राज्यों में इसके नाम और परंपराएं पूरी तरह भिन्न हैं।
उत्तर भारत में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व के रूप में मनाने की परंपरा है। उत्तर प्रदेश और बिहार में इस दिन खिचड़ी बनाने और दान करने का विशेष महत्व है। लोग गंगा स्नान करते हैं और तिल गुड़ से बने व्यंजन खाते हैं। यह दिन दान पुण्य और सामाजिक मेलजोल का प्रतीक माना जाता है।
दक्षिण भारत में यही पर्व पोंगल के नाम से जाना जाता है। तमिलनाडु में चार दिन तक चलने वाला यह उत्सव नई फसल के स्वागत का पर्व है। घरों के आंगन में रंगोली सजाई जाती है और दूध चावल से बना पोंगल पकाकर सूर्य देव को अर्पित किया जाता है। किसानों के लिए यह पर्व विशेष महत्व रखता है।
पंजाब और हरियाणा में इसे लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। अलाव जलाकर लोग उसके चारों ओर घूमते हैं और गीत संगीत के साथ नई फसल की खुशी मनाते हैं। तिल मूंगफली और गुड़ बांटकर आपसी भाईचारे को मजबूत किया जाता है।
महाराष्ट्र और गुजरात में मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा है। आसमान रंग बिरंगी पतंगों से भर जाता है और लोग तिलगुल बांटकर मीठे रिश्तों की कामना करते हैं। असम में यह पर्व भोगाली बिहू के नाम से जाना जाता है जहां सामूहिक भोज का आयोजन होता है।
इस तरह मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं बल्कि भारत की विविधता और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। अलग नाम अलग परंपराएं लेकिन भावना एक ही है प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और खुशहाली का उत्सव।