वाशिंगटन (अमेरिका):- यूरोप की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। फ्रांस में अमेरिकी मिलिट्री बेस को लेकर विरोध के स्वर तेज होते जा रहे हैं और इसी के साथ यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या फ्रांस NATO छोड़ने की दिशा में बढ़ रहा है। हाल के दिनों में फ्रांसीसी नेताओं और सांसदों के बयानों ने इस बहस को और हवा दे दी है।
फ्रांस में कुछ राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि देश की सुरक्षा नीति अमेरिका के इशारों पर नहीं चलनी चाहिए। उनका तर्क है कि फ्रांस एक संप्रभु राष्ट्र है और उसे अपनी सैन्य रणनीति स्वतंत्र रूप से तय करने का अधिकार है। इसी क्रम में अमेरिकी मिलिट्री बेस को हटाने की मांग उठाई जा रही है ताकि फ्रांस अपनी रक्षा नीति पर पूरा नियंत्रण रख सके।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि फ्रांस का NATO से पूरी तरह बाहर निकलना आसान नहीं है। फ्रांस NATO का संस्थापक सदस्य रहा है और यूरोपीय सुरक्षा ढांचे में उसकी अहम भूमिका है। बावजूद इसके फ्रांस पहले भी NATO के इंटीग्रेटेड मिलिट्री कमांड से अलग होने का फैसला कर चुका है और बाद में दोबारा जुड़ा था। इससे यह संकेत मिलता है कि पेरिस समय समय पर अपनी स्वतंत्र नीति पर जोर देता रहा है।
अमेरिका और फ्रांस के बीच हाल के वर्षों में कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए हैं। व्यापार नीतियों रक्षा सौदों और वैश्विक रणनीति को लेकर दोनों देशों के विचार हमेशा एक जैसे नहीं रहे। इसी पृष्ठभूमि में NATO को लेकर उठ रही यह बहस केवल सैन्य नहीं बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक भी मानी जा रही है।
फिलहाल फ्रांस सरकार की ओर से NATO छोड़ने का कोई आधिकारिक ऐलान नहीं किया गया है। लेकिन अमेरिकी प्रभाव को लेकर उठ रही आवाजें यह जरूर दिखाती हैं कि फ्रांस यूरोप की रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देना चाहता है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह बहस सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहती है या वास्तव में NATO और अमेरिका के साथ फ्रांस के रिश्तों में कोई बड़ा बदलाव आता है।