फ्रांस :- हाल ही में ऐसे दावे और सुर्खियां सामने आईं कि फ्रांस ने NATO (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) छोड़ दिया है या जल्द ही छोड़ने वाला है और पेरिस ने खुद को “अमेरिकी कठपुतली” बनने से इनकार कर दिया है। हालांकि फ्रांस ने NATO संगठन से पूरी तरह बाहर निकलने की घोषणा नहीं की, लेकिन हाल के राजनीतिक और कूटनीतिक तेवरों ने पारंपरिक गठजोड़ में दूरी दिखाने की कोशिश को मजबूर कर दिया है।
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि NATO एक सैन्य गठबंधन है जिसमें फ्रांस हमेशा से संस्थापक सदस्य रहा है। हालाँकि फ्रांस की नेशनल असेंबली ने NATO के इंटीग्रेटेड मिलिट्री कमांड से अलग होने और यूरोपीय सुरक्षा को प्राथमिकता देने वाले प्रस्ताव का समर्थन किया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि देश पूरी तरह संगठन से बाहर निकल रहा है।
पेरिस ने अमेरिका की नई विदेश नीति और कठोर रुख पर स्पष्ट असंतोष जाहिर किया है। फ्रांस के विदेश मंत्री और राष्ट्रपति ने दोनों ही यह रेखांकित किया है कि यूरोपीय देशों को स्वायत्त सुरक्षा रणनीति अपनानी चाहिए और अगर अमेरिका की कोई नीति यूरोपीय हितों या उपयुक्त सुरक्षा प्राथमिकताओं के खिलाफ है तो उसे खारिज करना “यूरोप का अधिकार” है।
एक बड़ा विवाद ग्रीनलैंड के मुद्दे पर भी छिड़ा हुआ है। अमेरिका की तरफ से इस क्षेत्र पर संभावित दावों और सेना उपयोग के तर्कों ने यूरोपीय नेताओं को NATO में आपसी भरोसे पर सवाल उठाने पर मजबूर किया है। फ्रांस ने स्पष्ट कहा है कि NATO देशों के बीच सैन्य टकराव या दूसरे सदस्य के खिलाफ कार्रवाइयाँ किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं हैं।
जहां तक ट्रेड डील फ्रीज़ और कड़े प्रतिबंधों का सवाल है, अमेरिका की नई व्यापार नीतियाँ और टैरिफ फैसलों से यूरोपियन यूनियन और अन्य देशों के साथ ट्रेड वार की संभावनाएँ बढ़ी हैं। खासकर जब अमेरिका ने संघीय स्तर पर कुछ व्यापार प्रतिबंध भी लगाए हैं और कई द्विपक्षीय वार्ता टली हैं।
्तो निष्कर्ष यह है कि फ्रांस ने NATO को पूरी तरह नहीं छोड़ा, लेकिन उसने अमेरिका के साथ अनिश्चित नीतिगत रुख और सैन्य‑सुरक्षा रणनीति के चलते अपनी स्वायत्तता और स्वतंत्र निर्णय लेने का स्पष्ट संकेत दिया है। यह स्थिति वैश्विक रणनीतिक संतुलन और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा गठजोड़ों की दिशा पर नए सवाल खड़े कर रही है।