Anti-corruption नई दिल्ली: भ्रष्टाचार के खिलाफ देश की कानूनी लड़ाई इस समय एक दोहरी चुनौती से जूझ रही है। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ में ‘एंटी-करप्शन क्लॉज’ (धारा 17A) की वैधता को लेकर मतभेद उभर आए हैं, वहीं दूसरी तरफ ताजा आंकड़े एक चिंताजनक तस्वीर पेश कर रहे हैं—भ्रष्टाचार के मामले तो बढ़ रहे हैं लेकिन अदालतों में सजा मिलने (conviction) के बजाय आरोपियों के बरी (acquittal) होने की दर कहीं अधिक है।
धारा 17A पर सुप्रीम कोर्ट में ‘स्प्लिट’ फैसला
हाल ही में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A पर अलग-अलग राय दी। यह धारा जांच एजेंसियों को किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले सरकार की पूर्व अनुमति लेने के लिए बाध्य करती है।
* जस्टिस नागरत्ना ने इसे ‘असंवैधानिक’ करार देते हुए कहा कि यह क्लॉज भ्रष्ट अधिकारियों के लिए ‘सुरक्षा कवच’ का काम करता है और जांच की राह में रोड़ा अटकाता है।
* जस्टिस विश्वनाथन ने इसे वैध माना लेकिन सुझाव दिया कि अनुमति देने का अधिकार सरकार के बजाय लोकपाल या लोकायुक्त जैसी स्वतंत्र संस्थाओं के पास होना चाहिए ताकि ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को बेवजह परेशान न किया जा सके। अब यह मामला अंतिम फैसले के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पास भेजा गया है।
बढ़ते केस, घटती सजा की दर
कानूनी विवादों के बीच डेटा से पता चलता है कि भ्रष्टाचार के मामलों में दोषसिद्धि की दर काफी कम है। उदाहरण के लिए 2023 में जहां 1,052 मामलों में सजा सुनाई गई वहीं 1,223 मामलों में आरोपी बरी या डिस्चार्ज हो गए। विशेषज्ञों का मानना है कि जांच में देरी गवाहों का मुकरना और तकनीकी कमियां (जैसे पूर्व मंजूरी न मिलना) भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को कमजोर कर रही हैं। यदि धारा 17A जैसे प्रावधानों पर स्पष्टता नहीं आती तो भ्रष्टाचार मुक्त भारत का लक्ष्य और भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।