नई दिल्ली :- भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत ने डिजिटल सेवाओं पर लगाए गए इक्वलाइजेशन लेवी यानी जिसे आम तौर पर गूगल टैक्स कहा जाता है उसे खत्म करने का फैसला किया है। इस फैसले को दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है लेकिन इसके साथ ही देश में संप्रभुता और कर नीति की स्वतंत्रता पर बहस भी तेज हो गई है।
गूगल टैक्स वर्ष 2016 में शुरू किया गया था जिसका उद्देश्य विदेशी डिजिटल कंपनियों पर कर लगाना था जो भारत में बड़ा कारोबार करती हैं लेकिन यहां पारंपरिक रूप से कर के दायरे में नहीं आती थीं। बाद में इसका दायरा बढ़ाकर ई कॉमर्स कंपनियों तक भी किया गया। सरकार का तर्क था कि इससे कर प्रणाली में समानता आएगी और घरेलू कंपनियों को बराबरी का मौका मिलेगा।
अब इस टैक्स को खत्म करने के फैसले को अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की शर्तों से जोड़कर देखा जा रहा है। जानकारों का कहना है कि अमेरिका लंबे समय से इस टैक्स का विरोध कर रहा था और इसे अपनी कंपनियों के खिलाफ भेदभावपूर्ण कदम मानता था। ऐसे में इसे हटाना द्विपक्षीय संबंधों को सहज बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि विपक्षी दल और कुछ आर्थिक विशेषज्ञ इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि भारत को अपनी कर नीति तय करने का पूरा अधिकार है और किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव में नीति बदलना दीर्घकालिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है। वहीं सरकार का पक्ष है कि वैश्विक कर सुधार ढांचे के तहत कई देश अपनी डिजिटल कर व्यवस्था में बदलाव कर रहे हैं और भारत भी उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।
यह मुद्दा अब सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रहा बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता और नीति निर्माण की स्वतंत्रता से भी जुड़ गया है। आने वाले समय में यह साफ होगा कि इस कदम का राजस्व और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है।