Delivery system : न्याय वितरण में वकीलों और जजों की साझा भूमिका

Delivery system /नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश, न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने हाल ही में न्याय वितरण प्रणाली में ‘बार’ (वकील) और ‘बेंच’ (न्यायाधीशों) के बीच के अटूट संबंध पर जोर देते हुए कहा कि ये दोनों संस्थाएं एक-दूसरे की पूरक हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि एक सुदृढ़ न्याय प्रणाली के लिए दोनों के बीच समन्वय और आपसी सम्मान अनिवार्य है, क्योंकि इनमें से किसी भी एक अंग की विफलता सीधे तौर पर आम नागरिक के न्याय के अधिकार को प्रभावित करती है।

न्याय के रथ के दो पहिये

एक विधिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि न्याय वितरण प्रणाली को एक रथ के समान माना जाना चाहिए, जिसके दो पहिये बार और बेंच हैं। उन्होंने कहा, “जिस तरह एक पहिये के बिना रथ नहीं चल सकता, उसी तरह वकीलों के सक्रिय सहयोग के बिना न्यायाधीश न्यायोचित निर्णय तक नहीं पहुँच सकते।”

उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि वकील केवल अपने मुवक्किल के प्रतिनिधि नहीं होते, बल्कि वे ‘ऑफिसर ऑफ द कोर्ट’ (अदालत के अधिकारी) होते हैं। उनका प्राथमिक कर्तव्य न्यायालय को सत्य तक पहुँचने और कानून की सही व्याख्या करने में सहायता करना है।

परस्पर विश्वास और गरिमा

न्यायूर्ति सूर्यकांत ने अपने संबोधन में इस बात पर चिंता व्यक्त की कि हाल के वर्षों में कई बार बार और बेंच के बीच संवाद की कमी देखी गई है। उन्होंने याद दिलाया कि विधिक बिरादरी की गरिमा बनाए रखना दोनों की साझा जिम्मेदारी है। “जब एक वकील अदालत में खड़ा होता है, तो वह केवल कानून की दलीलें नहीं दे रहा होता, बल्कि वह संविधान के मूल्यों की रक्षा कर रहा होता है। वहीं, बेंच का दायित्व है कि वह वकीलों को धैर्यपूर्वक सुने और एक निष्पक्ष वातावरण सुनिश्चित करे।”

बदलते दौर में चुनौतियाँ और तकनीक

2026 के इस आधुनिक युग में, जहाँ न्यायपालिका कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल माध्यमों को अपना रही है, न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि तकनीक कभी भी मानवीय विवेक का स्थान नहीं ले सकती। उन्होंने कहा कि बार और बेंच को मिलकर इन नई तकनीकों का उपयोग लंबित मामलों के बोझ को कम करने के लिए करना चाहिए।

उन्होंने युवा वकीलों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि उन्हें केवल मामलों को जीतने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय ‘न्याय’ दिलाने पर ध्यान देना चाहिए। न्याय की प्रक्रिया में ईमानदारी और शोध (Research) का कोई विकल्प नहीं है।

विधिक शिक्षा और प्रशिक्षण पर जोर

न्यायमूर्ति ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि बार और बेंच के बीच के इस सेतु को मजबूत करने की शुरुआत विधिक शिक्षा से ही होनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि युवा वकीलों के लिए निरंतर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए ताकि वे अदालती शिष्टाचार और बदलती कानूनी बारीकियों को समझ सकें। न्यायमूर्ति सूर्यकांत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब न्यायपालिका पर मुकदमों के बढ़ते बोझ और प्रक्रियागत देरी को लेकर चर्चा तेज है। उनका यह संदेश स्पष्ट है: न्याय कोई उत्पाद नहीं है जिसे खरीदा जा सके, बल्कि यह एक सामूहिक प्रयास है। यदि बार और बेंच के बीच सद्भाव बना रहता है, तो न्याय न केवल होगा, बल्कि वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचता हुआ दिखाई भी देगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *