Rajya sabha election 2026/पटना:-बिहार की राजनीति में इन दिनों कड़ाके की ठंड के बीच राज्यसभा चुनाव की तपिश ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। राज्य की पांच राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले आगामी चुनाव ने एक नया और दिलचस्प मोड़ ले लिया है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के खुद चुनाव लड़ने की चर्चाओं के बीच पांचवीं सीट को लेकर सस्पेंस गहरा गया है। जहां संख्या बल के हिसाब से एनडीए की राह आसान दिख रही है, वहीं तेजस्वी के दांव ने सत्ताधारी खेमे की नींद उड़ा दी है।
क्या है सीटों का गणित?
बिहार विधानसभा की वर्तमान स्थिति के अनुसार, एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए कम से कम 41 प्रथम वरीयता के मतों की आवश्यकता है। विधानसभा की कुल 243 सीटों में एनडीए के पास वर्तमान में प्रचंड बहुमत है। 2025 के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद बदले समीकरणों में भाजपा और जदयू गठबंधन (NDA) के पास करीब 202 विधायक हैं। इस आंकड़े के साथ एनडीए चार सीटें तो बेहद आसानी से जीत रहा है, लेकिन पांचवीं सीट के लिए उसे अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी। दूसरी ओर तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन (RJD, कांग्रेस और वामदल) के पास केवल 35 विधायक हैं। जीत के जादुई आंकड़े (41) तक पहुंचने के लिए उन्हें 6 और विधायकों के समर्थन की दरकार है। यहीं से ‘पांचवीं सीट’ का रहस्य शुरू होता है।
तेजस्वी का दांव: रणनीति या मनोवैज्ञानिक युद्ध?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि तेजस्वी यादव खुद राज्यसभा जा सकते हैं। हालांकि जानकारों का मानना है कि यह आरजेडी की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है। इसके पीछे दो मुख्य कारण बताए जा रहे हैं:
विधायकों को एकजुट रखना: चुनाव लड़ने का ऐलान कर तेजस्वी अपने कुनबे को बिखरने से बचाना चाहते हैं।
छोटे दलों पर डोरे: महागठबंधन की नजर ओवैसी की पार्टी (AIMIM) के 5 विधायकों और बसपा के 1 विधायक पर है। अगर ये 6 विधायक तेजस्वी के साथ आते हैं, तो विपक्ष का आंकड़ा 41 तक पहुंच जाएगा और मुकाबला बेहद करीबी हो जाएगा।
एआईएमआईएम (AIMIM) की भूमिका और एनडीए की घेराबंदी
इस पूरे खेल में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ‘किंगमेकर’ की भूमिका में है। हालांकि तेजस्वी और अख्तरुल ईमान के बीच मुलाकातों का दौर जारी है लेकिन ओवैसी की पार्टी ने अब तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। उधर, एनडीए ने भी अपनी रणनीति पुख्ता कर ली है। चिराग पासवान (LJP-R) और उपेंद्र कुशवाहा (RLM) ने अपनी-अपनी दावेदारी ठोक कर विपक्ष के लिए राह और कठिन कर दी है। भाजपा और जदयू का दावा है कि वे पांचों सीटें जीतकर विपक्ष का सूपड़ा साफ कर देंगे।
क्या होगा ‘क्रॉस वोटिंग’ का खतरा?
बिहार की राजनीति में ‘खेला’ शब्द अब नया नहीं है। तेजस्वी यादव ने जिस आत्मविश्वास के साथ जीत का दावा किया है उससे सत्ता पक्ष के भीतर भी सुगबुगाहट तेज हो गई है। क्या एनडीए के कुछ विधायक पाला बदल सकते हैं? या फिर विपक्षी खेमे में ही सेंधमारी होगी? 16 मार्च को होने वाले मतदान से पहले बिहार की राजनीति एक ऐसी शतरंज की बिसात बन गई है हर चाल रहस्यमयी है।