मेरठ (उत्तर प्रदेश):- मेरठ में डीएसपी सौम्या अस्थाना ने निर्देश दिया कि यदि किसी थाने के अंदर पत्रकार बिना अनुमति वीडियोग्राफी करते हैं तो उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जा सकता है। यह बयान सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर काफी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
पुलिस ऐसा क्यों कहती है
पुलिस पक्ष आम तौर पर कुछ कारण बताता है:
थाने के अंदर संवेदनशील दस्तावेज और केस से जुड़ी जानकारी होती है
आरोपियों या पीड़ितों की पहचान उजागर होने का खतरा रहता है
जांच प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है
सुरक्षा और गोपनीयता नियम लागू होते हैं
कई राज्यों में पुलिस परिसर के अंदर रिकॉर्डिंग के लिए पहले अनुमति लेने का नियम होता है।
पत्रकारों की आपत्ति क्या है
दूसरी तरफ पत्रकार संगठनों का कहना है:
थाने सार्वजनिक संस्थान हैं
पारदर्शिता लोकतंत्र का हिस्सा है
रिपोर्टिंग पर सख्ती प्रेस की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है
मनमानी कार्रवाई का खतरा बढ़ सकता है
यही वजह है कि ऐसे आदेश अक्सर बहस का विषय बन जाते हैं।
कानूनी स्थिति क्या कहती है
भारत में पत्रकारिता की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ी है।
लेकिन साथ ही प्रशासन को सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए उचित प्रतिबंध लगाने का अधिकार भी है।
👉 मतलब:
न पूरी तरह खुली रिकॉर्डिंग की छूट
न बिना कारण पूरी रोक — दोनों के बीच संतुलन जरूरी माना जाता है।
यह मुद्दा पत्रकार बनाम पुलिस नहीं बल्कि पारदर्शिता और संस्थागत नियमों के संतुलन का है। अंतिम स्थिति अक्सर राज्य सरकार के दिशा निर्देश या अदालत की व्याख्या से स्पष्ट होती है।