Muscle loss /नई दिल्ली: बुढ़ापे के साथ शरीर का कमजोर होना अक्सर एक सामान्य प्रक्रिया मान लिया जाता है लेकिन भारतीय डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने अब एक गंभीर चेतावनी जारी की है। भारत में बुजुर्गों के बीच बढ़ती मांसपेशियों की कमजोरी, जिसे मेडिकल भाषा में ‘सार्कोपेनिया’ (Sarcopenia) कहा जाता है, अब एक ‘साइलेंट महामारी’ का रूप ले रही है। इसी खतरे को देखते हुए, भारतीय स्वास्थ्य निकायों ने 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए नई गाइडलाइंस जारी की हैं।
क्या है सार्कोपेनिया? जिसे हम समझ रहे हैं सामान्य कमजोरी
सार्कोपेनिया वह स्थिति है जिसमें उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों का द्रव्यमान (Muscle Mass), उनकी ताकत और कार्यक्षमता तेजी से घटने लगती है। नई गाइडलाइंस के अनुसार, भारत में 60 साल से ऊपर के लगभग 15% से 20% बुजुर्ग इस स्थिति से जूझ रहे हैं, और सबसे डरावनी बात यह है कि इसके लक्षण बहुत ही ‘खामोश’ होते हैं।
अक्सर लोग इसे सिर्फ ‘बुढ़ापे की कमजोरी’ समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यह वास्तव में शरीर के भीतर हो रही मांसपेशियों की भारी क्षति है।
नई इंडियन गाइडलाइंस: मुख्य बिंदु और अपडेट्स
हालिया मेडिकल अपडेट्स के अनुसार, भारतीय विशेषज्ञों ने सार्कोपेनिया की पहचान और रोकथाम के लिए निम्नलिखित मानक तय किए हैं:
* पकड़ की मजबूती (Grip Strength): यदि किसी बुजुर्ग व्यक्ति की हाथ मिलाने या सामान उठाने की शक्ति कम हो रही है, तो यह सार्कोपेनिया का पहला संकेत है। गाइडलाइंस में ‘हैंडग्रिप स्ट्रेंथ’ टेस्ट को अनिवार्य जांच का हिस्सा बनाने की सलाह दी गई है।
* चलने की गति (Gait Speed): यदि चलने की रफ्तार धीमी हो गई है या कुर्सी से उठने में सहारे की जरूरत पड़ रही है, तो यह मांसपेशियों के गंभीर क्षरण की निशानी है।
* प्रोटीन की कमी: भारतीय खानपान में कार्बोहाइड्रेट की अधिकता और प्रोटीन की कमी को इस बीमारी का सबसे बड़ा कारण माना गया है। नई गाइडलाइंस बुजुर्गों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन (दाल, पनीर, अंडे, सोया) की मात्रा बढ़ाने पर जोर देती हैं।
यह स्थिति खतरनाक क्यों है?
विशेषज्ञों का कहना है कि मांसपेशियों का नुकसान केवल कमजोरी तक सीमित नहीं रहता। इसके परिणाम दूरगामी और घातक हो सकते हैं:
* गिरने और फ्रैक्चर का खतरा: मांसपेशियां शरीर के ढांचे को सहारा देती हैं। उनके कमजोर होने से संतुलन बिगड़ता है, जिससे गिरने और कूल्हे की हड्डी टूटने का जोखिम 3 गुना बढ़ जाता है।
* मेटाबॉलिक बीमारियां: मांसपेशियां ग्लूकोज को सोखने का काम करती हैं। इनकी कमी से टाइप-2 डायबिटीज और इंसुलिन रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ जाता है।
* निर्भरता: सार्कोपेनिया के कारण बुजुर्ग अपनी दैनिक गतिविधियों (नहाना, चलना, खाना) के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं, जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य और आत्म-सम्मान भी प्रभावित होता है।
बचाव के मंत्र: विशेषज्ञों की सलाह
डॉक्टरों के अनुसार, 60 की उम्र के बाद भी मांसपेशियों को बचाया जा सकता है:
* रेसिस्टेंस ट्रेनिंग (Resistance Training): केवल पैदल चलना काफी नहीं है। हल्के वजन उठाना या स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज मांसपेशियों को फिर से सक्रिय करने के लिए जरूरी है।
* विटामिन-D का स्तर: भारत में धूप होने के बावजूद विटामिन-D की भारी कमी है, जो मांसपेशियों और हड्डियों के बीच के जुड़ाव को कमजोर करती है। इसकी नियमित जांच और सप्लीमेंट जरूरी हैं।
* पर्याप्त नींद और हाइड्रेशन: मांसपेशियों की मरम्मत के लिए 7-8 घंटे की गहरी नींद अनिवार्य है।