Education reform/लखनऊ: उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने राज्य की मदरसा शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने और उसे मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में एक बड़ा और क्रांतिकारी कदम उठाया है। सरकार ने निर्णय लिया है कि प्रदेश के मदरसों में दी जाने वाली उच्च शिक्षा, यानी कामिल (स्नातक) और फाजिल (स्नातकोत्तर) की डिग्रियां अब सीधे राज्य विश्वविद्यालयों (State Universities) के माध्यम से प्रदान की जाएंगी।
यह फैसला मदरसा बोर्ड के छात्रों के लिए भविष्य के नए द्वार खोलने वाला माना जा रहा है। अब तक मदरसा शिक्षा परिषद खुद इन परीक्षाओं का आयोजन करती थी, लेकिन नई व्यवस्था लागू होने के बाद परीक्षाओं का संचालन और डिग्री वितरण संबंधित विश्वविद्यालयों के दायरे में आएगा।
क्या है नया फैसला और इसकी जरूरत क्यों पड़ी?
उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद के तहत हजारों छात्र कामिल और फाजिल की पढ़ाई करते हैं। हालांकि, इन डिग्रियों की समकक्षता को लेकर अक्सर विवाद और असमंजस की स्थिति बनी रहती थी। कई बार मदरसा छात्रों को सरकारी नौकरियों या अन्य विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के लिए आवेदन करते समय अपनी डिग्री की मान्यता साबित करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।
सरकार के इस फैसले के पीछे मुख्य उद्देश्य मदरसा शिक्षा के स्तर को सुधारना और उसे यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के मानकों के करीब लाना है। जब ये परीक्षाएं विश्वविद्यालयों के माध्यम से होंगी, तो छात्रों को मिलने वाली डिग्री की स्वीकार्यता न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश और विदेशों में भी बढ़ जाएगी।
मुख्यधारा से जुड़ेंगे छात्र, बढ़ेंगे रोजगार के अवसर
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से मदरसा छात्रों में हीन भावना समाप्त होगी। अब वे खुद को केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित न मानकर सामान्य विश्वविद्यालय के छात्रों के समकक्ष खड़ा पाएंगे।
* मान्यता की समस्या खत्म: यूनिवर्सिटी से जुड़ने के बाद कामिल और फाजिल की डिग्री को बीए और एमए के बराबर मान्यता मिलने में आसानी होगी।
* प्रतियोगी परीक्षाएं: छात्र अब बेझिझक यूपीएससी, यूपीपीएससी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में स्नातक स्तर की पात्रता के साथ शामिल हो सकेंगे।
* पारदर्शिता: परीक्षाओं का आयोजन यूनिवर्सिटी द्वारा किए जाने से मूल्यांकन प्रक्रिया और परीक्षा संचालन में अधिक पारदर्शिता आएगी।
शिक्षा जगत और समाज की प्रतिक्रिया
इस फैसले पर मिली-जुली लेकिन काफी सकारात्मक प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। शिक्षाविदों का कहना है कि यह “कलम और किताब” के समन्वय की दिशा में एक अच्छी पहल है। मदरसों में दीनी तालीम के साथ-साथ आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था जुड़ने से छात्रों का बौद्धिक विकास होगा।
वहीं, कुछ मुस्लिम धर्मगुरुओं और संगठनों ने इस पर सावधानी बरतने की सलाह दी है। उनका कहना है कि व्यवस्था परिवर्तन के दौरान मदरसों की स्वायत्तता और उनके धार्मिक स्वरूप को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह बदलाव केवल शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों के करियर को ध्यान में रखकर किया गया है।
भविष्य की राह
योगी सरकार का यह फैसला मदरसा आधुनिकीकरण योजना का ही एक हिस्सा है जिसके तहत पहले एनसीईआरटी (NCERT) का पाठ्यक्रम लागू किया गया था और अब उच्च शिक्षा को यूनिवर्सिटी से जोड़ने की तैयारी है। उत्तर प्रदेश सरकार की इस पहल से अन्य राज्य भी प्रेरणा ले सकते हैं।