गुरु सेवा ही परम कर्तव्य: अनिरुद्ध की समर्पण गाथा

 

जौनपुर (उत्तर प्रदेश):- चंदवक, जौनपुर की धरती से जुड़ी यह प्रेरणादायक कथा हमें सिखाती है कि सच्ची साधना क्या होती है। प्राचीन काल में अनिरुद्ध नाम का एक शिष्य अपने गुरु की सेवा में पूर्णतः समर्पित था। आश्रम का जीवन सरल और अनुशासित था, जहां अनिरुद्ध प्रतिदिन प्रातः उठकर सफाई करता, नदी से जल लाता, अग्नि के लिए लकड़ियां जुटाता और गुरु के लिए फल-फूल एकत्र करता था। दिनभर सेवा में लगे रहने के कारण उसे विश्राम का समय बहुत कम मिलता, लेकिन उसके चेहरे पर कभी थकान नहीं दिखती थी।

अन्य शिष्य अक्सर उससे पूछते कि क्या उसे कष्ट नहीं होता, तो वह मुस्कुराकर कहता—“गुरु सेवा ही मेरा परम कर्तव्य है।” एक दिन जब गुरु किसी कार्य से आश्रम से बाहर गए थे, उसी दौरान भीषण वर्षा और तूफान ने आश्रम के एक हिस्से को क्षतिग्रस्त कर दिया। बाकी सभी शिष्य सुरक्षित स्थान पर चले गए, लेकिन अनिरुद्ध पूरी रात वर्षा में भीगते हुए उस टूटे हुए हिस्से को संभालता रहा, ताकि आश्रम को और नुकसान न हो।

प्रातःकाल जब गुरु लौटे और उन्होंने यह दृश्य देखा, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अनिरुद्ध को बुलाकर कहा—“वत्स, तुमने निस्वार्थ भाव से सेवा की है, यही सच्ची साधना है। तप, जप और यज्ञ से भी बढ़कर सेवा का महत्व होता है, क्योंकि इसमें अहंकार नहीं होता।” यह सुनकर अनिरुद्ध के हृदय में गहन शांति का संचार हुआ।

इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग बाहरी आडंबर में नहीं, बल्कि निस्वार्थ सेवा, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा में छिपा होता है।

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