High Diabetes नई दिल्ली :- भारत में डायबिटीज़ का बोझ अब सिर्फ शुगर लेवल की बीमारी नहीं रह गया है यह देश की दिल (हार्ट) की सेहत को भी गहराई से प्रभावित कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती डायबिटीज़ दर धीरे-धीरे हृदय की कार्यक्षमता को कमजोर कर रही है और देश में एक चुपचाप बढ़ती स्वास्थ्य आपदा का रूप ले रही है। कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. रामकांत पांडा ने बताया है कि भारत में लंबे समय तक उच्च ग्लूकोज (शुगर) स्तर रक्त वाहिकाओं और दिल के मांसपेशियों को नुकसान पहुंचाता है, जिससे हृदय कठोर हो जाता है और उसकी पंपिंग क्षमता कम हो जाती है। यह स्थिति “हार्ट फेइल्योर विथ प्रिज़रव्ड ईजेक्शन फ्रैक्शन (HFpEF)” जैसी जटिल बीमारियों का कारण बन सकती है जिसमें दिल का पंप तो काम करता है लेकिन उसे भरने में समस्या होती है।
डायबिटीज़ और हृदय रोग के बीच यह गहरा संबंध घरेलू जीवनशैली बदलावों की वजह से और भी बढ़ गया है। शहरी जीवन में लंबे कामकाजी घंटे, अधिक शक्कर और प्रोसेस्ड फूड्स कम शारीरिक गतिविधि और अनियमित नींद जैसे कारक अब आम हो चुके हैं। डेटा भी चिंताजनक है: आइटीमार की रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज के शिकार हैं, जबकि करोड़ों और ऐसे हैं जिन्हें अभी पता भी नहीं है कि वे डायबिटीज की ओर बढ़ रहे हैं। इस बढ़ती संख्या का मतलब यह है कि लाखों लोग बिना जाने ही नई स्वास्थ्य जटिलताओं के खतरे से जूझ रहे हैं।
दिल की बीमारी के साथ-साथ डायबिटीज़ आर्थिक बोझ भी बढ़ा रही है — अधिक लोग इलाज, दवाइयों और नियमित जांच पर निर्भर हो गए हैं। यह बीमारी सिर्फ व्यक्तिगत तक सीमित नहीं; यह सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर भी भारी दबाव डाल रही है।लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि खतरे को रोका जा सकता है। दिल के डॉक्टरों द्वारा सुझाए गए “3 ए” — गतिविधि, सतर्कता, जागरूकता — जैसी आदतें अपनाकर काफी हद तक जोखिम कम किया जा सकता है। नियमित ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर की जांच, संतुलित आहार (सब्जियां, फल, साबुत अनाज), और शारीरिक व्यायाम (जैसे सप्ताह में 300 मिनट तेज चलना) बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि हमें परिवार, समुदाय और स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा को मजबूत करना होगा। यही नहीं, खाद्य उद्योग और सार्वजनिक नीति स्तर पर स्वस्थ विकल्पों को बढ़ावा देना होगा ताकि लोग बेहतर जीवनशैली अपना सकें। डायबिटीज़ और हृदय रोग की यह खामोश जुड़नार भारत के लिए सिर्फ एक स्वास्थ्य समस्या नहीं है — यह एक चेतावनी है कि हमें अब जल्द और सामूहिक कार्रवाई करनी होगी। देश को अपनी जीवनशैली पर पुनर्विचार करना होगा नहीं तो यह “चुप चुप में टूटता दिल” और अधिक लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ सकता है।