बेंगलुरु: दवाओं की खरीद कीमत और मरीजों से वसूली जाने वाली रकम के अंतर पर उठे सवाल
किडनी रोग: (बेंगलुरु:) कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली महंगी दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने की दिशा में केंद्र सरकार की पहल का कर्नाटक सरकार ने स्वागत किया है। राज्य ने केंद्र से मांग की है कि कैंसर की दवाओं तक ही कीमतों को नियंत्रित करने की व्यवस्था सीमित न रखी जाए, बल्कि हृदय रोग और किडनी की बीमारियों के उपचार में इस्तेमाल होने वाली अन्य महंगी जीवनरक्षक दवाओं को भी इसके दायरे में लाया जाए। कर्नाटक सरकार का कहना है कि दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता बढ़ाने और अनुचित व्यापारिक मार्जिन पर नियंत्रण लगाने से मरीजों और उनके परिवारों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ कम किया जा सकता है।
कर्नाटक के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री यू.टी. खादर ने आवश्यक दवाओं, खासकर कैंसर की दवाओं पर अत्यधिक मार्जिन को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का स्वागत किया। राज्य सरकार ने केंद्र और राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) से आग्रह किया है कि दवाओं की कीमतों को तर्कसंगत बनाने के लिए प्रस्तावित कदम जल्द लागू किए जाएं और उनका लाभ सीधे मरीजों तक पहुंचे।
किडनी रोग: यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में कई बार लंबे समय तक महंगी दवाओं, कीमोथेरेपी और टारगेटेड थेरेपी की जरूरत पड़ती है। दवाओं की ऊंची कीमतें मरीजों के परिवारों पर भारी आर्थिक दबाव डाल सकती हैं। कर्नाटक सरकार चाहती है कि दवा की वास्तविक खरीद लागत और मरीज से वसूली जाने वाली अंतिम कीमत के बीच के अंतर को कम करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमतों पर क्या सवाल उठाए?
किडनी रोग: दवाओं की कीमतों और उन पर लगाए जाने वाले व्यापारिक मार्जिन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया था कि आवश्यक दवाओं, जिनमें कैंसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाएं भी शामिल हैं, का अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP खुदरा विक्रेता को मिलने वाली कीमत (PTR) से 16 प्रतिशत अधिक तक सीमित क्यों नहीं किया जा सकता।
यह 16 प्रतिशत का मार्जिन अनुसूचित दवाओं के लिए औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश, 2013 (DPCO) के तहत लागू व्यवस्था से जुड़ा है। हालांकि, सभी दवाओं पर एक समान नियम लागू नहीं है। कई गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों पर नियामकीय व्यवस्था अलग हो सकती है।
किडनी रोग:अदालत ने दवाओं की खरीद कीमत और मरीजों से वसूले जाने वाले अंतिम मूल्य के बीच बड़े अंतर को लेकर चिंता जताई थी। इस बहस का मुख्य सवाल यह है कि जब किसी दवा को अस्पताल या अन्य संस्थान अपेक्षाकृत कम कीमत पर खरीदते हैं, तो मरीज को वही दवा काफी अधिक कीमत पर क्यों मिलती है।
दवाओं की कीमत में अंतर के पीछे खरीद व्यवस्था, वितरण, भंडारण और अन्य कारोबारी खर्च जैसे कारक भी हो सकते हैं। लेकिन जब कीमतों में बहुत अधिक अंतर सामने आता है, तो पारदर्शिता और उचित मार्जिन को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसी वजह से दवा मूल्य नियंत्रण और मरीजों को दिए जाने वाले बिल में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराने की मांग तेज हुई है।
253 दवाओं और चिकित्सा सामग्रियों की कीमतों पर जताई चिंता
किडनी रोग: कर्नाटक सरकार ने 23 सितंबर 2026 को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा को पत्र लिखकर इस मामले में राष्ट्रीय स्तर पर हस्तक्षेप की मांग की थी। राज्य के मुताबिक, निरीक्षण के दौरान दवाओं और चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियों की खरीद या लैंडिंग लागत और मरीजों से वसूले जाने वाले अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच काफी अंतर देखने को मिला।
राज्य सरकार ने ऐसे मूल्य संबंधी मुद्दों के दायरे में 253 दवाओं और चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों की पहचान की थी। इसके बाद केंद्र से महंगी कैंसररोधी दवाओं को मूल्य नियंत्रण व्यवस्था के दायरे में लाने और उनके व्यापारिक मार्जिन पर स्पष्ट सीमा निर्धारित करने का आग्रह किया गया।
किडनी रोग: कर्नाटक ने विशेष रूप से उन्नत कीमोथेरेपी, टारगेटेड थेरेपी और कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली अन्य महंगी दवाओं को औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश के तहत लाने की मांग की है। टारगेटेड थेरेपी में ऐसी दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है, जो कैंसर कोशिकाओं या उनसे जुड़ी विशेष जैविक प्रक्रियाओं को लक्ष्य बनाती हैं। कुछ मामलों में इन दवाओं का खर्च काफी अधिक हो सकता है।
राज्य का मानना है कि महंगी दवाओं की कीमतों को लेकर स्पष्ट नियम होने से मरीजों को इलाज के खर्च का बेहतर अनुमान मिल सकेगा और अत्यधिक कीमत वसूले जाने की आशंका को कम करने में मदद मिलेगी।
गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन का प्रस्ताव
किडनी रोग: दवाओं की कीमतों को लेकर जारी इस बहस के बीच राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने 8 अक्टूबर को हुई बैठक में कुछ गैर-अनुसूचित कैंसररोधी दवाओं के व्यापारिक मार्जिन को तर्कसंगत बनाने के प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दी।
इस प्रस्ताव के तहत चिह्नित गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) पर ट्रेड मार्जिन को 30 प्रतिशत तक सीमित करने की योजना है। यह कदम औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश, 2013 के पैराग्राफ 19 के तहत प्रस्तावित है। हालांकि, इस व्यवस्था में शामिल की जाने वाली दवाओं की अंतिम सूची तय होना अभी बाकी है।
किडनी रोग: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के तहत विशेषज्ञ समिति गठित करने के लिए कहा गया है। यह समिति उन कैंसररोधी दवाओं की पहचान करने की सिफारिश करेगी, जिन्हें प्रस्तावित मूल्य नियंत्रण के दायरे में शामिल किया जाना चाहिए। समिति से 14 अक्टूबर तक रिपोर्ट देने की अपेक्षा की गई है।
केंद्र सरकार के अनुमान के अनुसार, प्रस्तावित उपाय लागू होने पर कई कैंसर दवाओं के MRP में 20 से 70 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। इससे मरीजों को कुल मिलाकर लगभग 2,500 करोड़ रुपये की बचत होने का अनुमान जताया गया है। यह अनुमानित बचत है; वास्तविक लाभ दवाओं की अंतिम सूची, लागू होने वाले नियमों और मरीजों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं पर निर्भर करेगा।
अस्पतालों और फार्मेसियों के बिल में लागत का खुलासा करने की मांग
किडनी रोग: कर्नाटक सरकार ने दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए अस्पतालों और फार्मेसियों के बिलों में भी बदलाव की मांग की है। राज्य चाहता है कि मरीजों को दिए जाने वाले बिल में दवाओं की खरीद लागत, अधिकतम खुदरा मूल्य और अतिरिक्त मार्जिन का स्पष्ट उल्लेख हो।
इस संबंध में राज्य सरकार ने 1 अक्टूबर को स्वास्थ्य संस्थानों के लिए एक सर्कुलर जारी किया था। इसमें मरीजों को दिए जाने वाले बिल में दवाओं की लैंडिंग लागत और MRP दोनों दर्ज करने का निर्देश दिया गया है। ये निर्देश फिलहाल परामर्शात्मक प्रकृति के हैं और इन्हें 1 नवंबर 2026 से लागू करने का प्रस्ताव है।
किडनी रोग: अगर मरीज को बिल में दवा की खरीद लागत और अधिकतम खुदरा मूल्य की जानकारी मिलती है, तो वह इलाज के खर्च को बेहतर तरीके से समझ सकता है। इससे अस्पतालों और फार्मेसियों के बिलों में पारदर्शिता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इस व्यवस्था का वास्तविक प्रभाव इसके क्रियान्वयन और निगरानी पर निर्भर करेगा।
कर्नाटक ने दवा निर्माताओं की कीमतों, अस्पतालों की खरीद लागत और मरीजों से वसूली जाने वाली अंतिम रकम के बीच अंतर का अध्ययन करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सर्वेक्षण कराने का सुझाव भी दिया है। इसके साथ ही, राज्य ने केंद्र के विभिन्न मंत्रालयों, NPPA, राज्य सरकारों, अस्पतालों, बीमा कंपनियों और चिकित्सा विशेषज्ञों को शामिल करते हुए एक अंतर-मंत्रालयी विशेषज्ञ समिति बनाने की मांग की है।
अब हृदय और किडनी की महंगी दवाओं को भी दायरे में लाने की मांग
किडनी रोग: कर्नाटक सरकार की मांग केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित नहीं है। राज्य ने कहा है कि हृदय रोग और किडनी की बीमारियों के उपचार में इस्तेमाल होने वाली महंगी जीवनरक्षक दवाओं पर भी उचित मूल्य नियंत्रण व्यवस्था लागू करने पर विचार किया जाना चाहिए।
हृदय और किडनी से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों में मरीजों को लंबे समय तक दवाएं लेनी पड़ सकती हैं। ऐसे मामलों में दवाओं का लगातार खर्च परिवार के बजट पर असर डाल सकता है। राज्य का तर्क है कि आवश्यक और महंगी दवाओं पर अनुचित मार्जिन रोकने तथा कीमतों में पारदर्शिता लाने से आम लोगों को राहत मिल सकती है।
किडनी रोग: हालांकि, कैंसर की दवाओं के लिए प्रस्तावित 30 प्रतिशत मार्जिन सीमा को अन्य दवाओं पर लागू करने से पहले संबंधित दवाओं की प्रकृति, उपलब्धता, लागत और नियामकीय प्रावधानों का आकलन करना होगा। कर्नाटक ने केंद्र से व्यापक और समयबद्ध कार्रवाई की मांग की है, लेकिन अन्य बीमारियों की दवाओं को शामिल करने पर अंतिम फैसला केंद्र सरकार और संबंधित नियामक संस्थाओं को करना होगा।
मरीजों को राहत मिलने की उम्मीद, लेकिन अंतिम नियमों पर नजर
किडनी रोग: दवा मूल्य नियंत्रण को लेकर केंद्र की पहल और कर्नाटक सरकार की मांग ने इलाज की लागत तथा स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। प्रस्तावित 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन सीमा लागू होने पर कुछ महंगी कैंसर दवाओं की कीमतों में कमी आने की संभावना है। वहीं, हृदय और किडनी की दवाओं को भी ऐसे उपायों के दायरे में लाने की मांग से यह बहस और व्यापक हो गई है।
फिलहाल, गैर-अनुसूचित कैंसररोधी दवाओं की अंतिम सूची और विशेषज्ञ समिति की सिफारिशें महत्वपूर्ण होंगी। इसके बाद ही स्पष्ट होगा कि कौन-सी दवाएं प्रस्तावित व्यवस्था में शामिल होंगी और मरीजों को कितनी राहत मिल सकती है।
किडनी रोग: कर्नाटक सरकार ने केंद्र से आग्रह किया है कि दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता बढ़ाने, अनुचित मार्जिन पर नियंत्रण लगाने और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम करने के लिए समयबद्ध कदम उठाए जाएं। अब नजर केंद्र सरकार के अगले फैसलों और प्रस्तावित नियमों के अंतिम स्वरूप पर रहेगी