सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: दाखिले से पहले तय होनी चाहिए पूरे कोर्स की फीस
(नई दिल्ली): सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेशनल कोर्स की फीस को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी छात्र के दाखिले के बाद कोर्स के बीच में फीस में मनमाने तरीके से बढ़ोतरी नहीं की जा सकती। अदालत के अनुसार, सामान्य तौर पर पूरे पाठ्यक्रम की फीस दाखिले की प्रक्रिया शुरू होने से पहले निर्धारित की जानी चाहिए, ताकि छात्रों और उनके अभिभावकों को पहले से पता हो कि पढ़ाई पूरी करने में कितना खर्च आएगा।
यह फैसला इंजीनियरिंग, मेडिकल, फार्मेसी जैसे प्रोफेशनल पाठ्यक्रम संचालित करने वाले निजी उच्च शिक्षण संस्थानों से जुड़े मामले में आया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि फीस में बदलाव केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जा सकता है।
किन परिस्थितियों में बढ़ सकती है फीस?
न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि फीस में बदलाव की अनुमति हर स्थिति में पूरी तरह समाप्त नहीं होती। यदि अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण संस्थान के खर्च में असाधारण वृद्धि होती है या कानून में बदलाव से अतिरिक्त खर्च पैदा होता है, तो सीमित परिस्थितियों में फीस संशोधन पर विचार किया जा सकता है।
हालांकि, अदालत ने जोर दिया कि ऐसी छूट सामान्य नियम नहीं बननी चाहिए। संस्थानों और संबंधित अधिकारियों को पहले से संभावित खर्च का आकलन करना चाहिए, ताकि छात्रों पर पाठ्यक्रम के बीच में अचानक आर्थिक बोझ न पड़े।
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: छात्रों और अभिभावकों को पहले से मिलेगी वित्तीय स्पष्टता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चार या पांच साल के प्रोफेशनल कोर्स में दाखिला लेने वाले छात्र को शुरुआत में ही अपनी पूरी पढ़ाई की वित्तीय जिम्मेदारी का अंदाजा होना चाहिए। फीस पहले से तय होने पर परिवार अपनी आर्थिक योजना बेहतर तरीके से बना सकते हैं और उपलब्ध विकल्पों के आधार पर सोच-समझकर कॉलेज का चयन कर सकते हैं।
अदालत ने फीस निर्धारण की प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता को महत्वपूर्ण बताया। फीस तय करने वाली समितियों को शिक्षकों के वेतन, बुनियादी ढांचे, रखरखाव, तकनीक और वैधानिक आवश्यकताओं जैसे खर्चों का आकलन करते हुए भविष्य में संभावित बढ़ोतरी को भी ध्यान में रखना चाहिए।
पश्चिम बंगाल के इंजीनियरिंग कॉलेज से जुड़ा था मामला
यह फैसला डॉ. बीसी रॉय इंजीनियरिंग कॉलेज और पश्चिम बंगाल सरकार से जुड़े विवाद में आया। मामला उन छात्रों की फीस बढ़ोतरी से संबंधित था, जिन्होंने 2023 में बीटेक पाठ्यक्रम में दाखिला लिया था। बाद में राज्य सरकार की अधिसूचना के आधार पर कॉलेज ने फीस बढ़ाई, जिसे पहले से दाखिला ले चुके छात्रों पर लागू करने को चुनौती दी गई।
कलकत्ता हाई कोर्ट की खंडपीठ ने पहले निर्देश दिया था कि बढ़ी हुई फीस उन छात्रों पर लागू नहीं होगी, जिन्होंने संबंधित अधिसूचना से पहले दाखिला लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों को राहत देने वाले इन निर्देशों को बरकरार रखा, हालांकि हाई कोर्ट के फैसले में दिए गए कुछ कानूनी तर्कों से असहमति जताई।
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: फीस निर्धारण समितियों की भूमिका भी अहम
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित फीस निर्धारण समितियों को अधिक प्रभावी ढंग से काम करने पर जोर दिया। अदालत के मुताबिक, इन समितियों को संस्थानों के खर्च का विशेषज्ञता के साथ मूल्यांकन करना चाहिए और प्रवेश प्रक्रिया शुरू होने से पहले सक्षम अधिकारियों को अपनी सिफारिशें देनी चाहिए।
इस फैसले से प्रोफेशनल कोर्स में पढ़ रहे छात्रों को फीस संबंधी अनिश्चितता से राहत मिलने की उम्मीद है। साथ ही, यह संस्थानों के लिए भी स्पष्ट करता है कि वित्तीय जरूरतों का आकलन समय रहते करना जरूरी है और बीच सत्र में फीस बढ़ाना केवल अपवादस्वरूप ही संभव होगा।