नई दिल्ली :- निजी मेडिकल कॉलेजों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के प्रमाणपत्रों के दुरुपयोग ने स्वास्थ्य शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। हाल ही में सामने आए मामलों ने यह साफ कर दिया है कि कई छात्र ऐसे प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल कर रहे हैं जो वास्तविक आर्थिक स्थिति को प्रतिबिंबित ही नहीं करते। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब यह पता चलता है कि ईडब्ल्यूएस श्रेणी में दाखिला लेने वाले कुछ उम्मीदवार उन्हीं कॉलेजों में मैनेजमेंट या एनआरआई कोटा में भी सीटें ले रहे हैं जहां ट्यूशन फीस पच्चीस लाख रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये से भी अधिक प्रतिवर्ष तक होती है।
इस तरह के मामलों से यह स्पष्ट है कि ईडब्ल्यूएस श्रेणी का उद्देश्य कमजोर तबके को शिक्षा में अवसर देना है परंतु गलत तरीके से प्रमाणपत्र बनवाकर कुछ लोग इस संवेदनशील व्यवस्था का अनुचित लाभ उठा रहे हैं। इससे वास्तविक पात्र छात्रों के सामने प्रतिस्पर्धा और भी कठिन हो जाती है क्योंकि किसी सक्षम आर्थिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार द्वारा वर्ग का दुरुपयोग करने से जरूरतमंद छात्रों का हक छिन जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की अनियमितता से न केवल शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता कम होती है बल्कि समाज में असमानता भी बढ़ती है। यदि किसी छात्र के पास मैनेजमेंट या एनआरआई कोटा की अत्यधिक फीस भरने की क्षमता है तो वह ईडब्ल्यूएस श्रेणी में स्थान पाने का वास्तविक पात्र किसी भी प्रकार से नहीं माना जा सकता। इसलिए इस पूरी प्रक्रिया की कठोर जांच की आवश्यकता है ताकि योग्यता और आर्थिक स्थिति दोनों का सही मूल्यांकन हो सके।
सरकार और मेडिकल शिक्षा नियामक संस्थाओं के लिए यह समय है कि वे ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया को पारदर्शी और सख्त बनाएं। साथ ही उन कॉलेजों पर भी निगरानी बढ़ानी होगी जहां इस प्रकार की दोहरी पात्रता का फायदा उठाने की प्रवृत्ति पाई जा रही है। जब तक प्रमाणपत्र जांच की प्रणाली कठोर और तकनीकी रूप से सक्षम नहीं होगी तब तक ऐसे दुरुपयोगों पर रोक लगाना कठिन बना रहेगा।