नई दिल्ली :- नई दिल्ली से जारी ताजा सरकारी आंकड़े एक गंभीर वास्तविकता को सामने रखते हैं। देश में बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों की सुनवाई बेहद धीमी गति से आगे बढ़ रही है और स्थिति चिंताजनक हो चुकी है। पॉक्सो कानून के तहत दर्ज 35 हजार से अधिक मामले दो साल से भी ज्यादा समय से अदालतों में लंबित पड़े हैं। यह देरी न केवल पीड़ित बच्चों और उनके परिवारों के लिए मानसिक बोझ बन रही है बल्कि न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी बड़े सवाल खड़े कर रही है।
पॉक्सो कानून का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करना और दोषियों को कठोर दंड देना है ताकि समाज में डर और जागरूकता दोनों का वातावरण बने। लेकिन जब मामलों का निपटारा वर्षों तक लंबा खिंचता है तो पीड़ितों को न्याय मिलने की उम्मीद कमजोर पड़ने लगती है। कई परिवार लगातार तारीखें मिलने से थक जाते हैं और कुछ मामलों में गवाही कमजोर पड़ने लगती है जिससे न्याय देने की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लंबित मामलों की बढ़ती संख्या का एक कारण अदालतों में विशेष न्यायालयों और प्रशिक्षित अधिकारियों की कमी भी है। कई राज्यों में पॉक्सो मामलों की सुनवाई के लिए आवश्यक ढांचा अब भी पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो पाया है। इसके अलावा जांच प्रक्रिया में देरी और गवाहों की सुरक्षा से जुड़ी समस्याएं भी इन मामलों को लंबा खींचने में भूमिका निभाती हैं।
इस स्थिति ने बाल अधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी चिंतित कर दिया है। उनका कहना है कि जब तक न्यायिक ढांचा मजबूत नहीं होगा और मामलों का तेजी से निपटारा नहीं किया जाएगा तब तक बच्चों की सुरक्षा को पूरी तरह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। सरकार ने समय समय पर सुधारों की बात कही है लेकिन आंकड़े बताते हैं कि अभी बहुत काम बाकी है।
जरूरत इस बात की है कि पॉक्सो मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने के लिए एक प्रभावी और सुव्यवस्थित रणनीति बनाई जाए। तेज सुनवाई पीड़ितों के मन से भय दूर करती है और समाज को एक स्पष्ट संदेश देती है कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।