हर नेता की इच्छा होती है कि जब वह जनता के बीच जाए तो लोग उत्साह के साथ उसके आसपास इकट्ठा हों नारे लगाएं और समर्थन प्रकट करें। राजनीतिक जीवन में ऐसा स्वागत शक्ति और लोकप्रियता का प्रतीक माना जाता है। किसी नेता के लिए यह माहौल आत्मविश्वास भी बढ़ाता है और यह संकेत भी देता है कि जनता उसके काम को महत्व दे रही है। परंतु यही भीड़ कई बार अनजाने में खतरे का कारण बन जाती है क्योंकि उत्साह का स्तर कब नियंत्रण से बाहर हो जाए इसका अंदाजा लगाना कठिन होता है।
भीड़ के बीच नेता को आगे बढ़ाने की होड़ धक्का मुक्की और अफरातफरी के माहौल को जन्म दे देती है। कई बार सुरक्षा घेरे को भीड़ तोड़ देती है और स्थिति अनियंत्रित हो जाती है। लोगों का उमड़ता जोश धीरे धीरे अव्यवस्था में बदल सकता है और नेता के साथ साथ उसके समर्थकों के लिए भी गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। इतिहास गवाह है कि कई बार ऐसी भीड़ ने बड़े नेताओं को चोटिल किया है और कभी कभी उनकी सुरक्षा पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा किया है।
नेताओं को यह समझने की आवश्यकता है कि लोकप्रियता का अर्थ भीड़ का अनियंत्रित होना नहीं है बल्कि उन लोगों का व्यवस्थित सहयोग है जो वास्तव में नेतृत्व के विचारों और कार्यों से जुड़े होते हैं। सुरक्षा प्रबंधन और भीड़ नियंत्रण जरूरी है ताकि कोई दुर्घटना ना हो और कोई उत्साह दुखद अनुभव में न बदल जाए।
अंत में यह बात स्पष्ट है कि नेता का उद्देश्य केवल भीड़ जुटाना नहीं होना चाहिए बल्कि हर समर्थक की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना भी उसकी जिम्मेदारी है। जब नेतृत्व लोकप्रियता और जिम्मेदारी दोनों को साथ लेकर चलता है तभी सच्चा राजनीतिक संतुलन स्थापित होता है।