Bajrangbali hain kya, ki ekaek udenge नई दिल्ली: चुनावी रणनीतिकार से सक्रिय राजनीति में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे प्रशांत किशोर (पीके) आजकल बिहार में अपनी ‘जन सुराज’ पदयात्रा के माध्यम से जनता के बीच हैं। उनकी कोशिश है कि वह जमीनी स्तर पर बदलाव लाकर एक नई राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरें। हालांकि जिस गति से वह राजनीति में अपना कद बढ़ाना चाहते हैं उसको लेकर आम वोटर्स के मन में अभी भी संशय है। उनकी मेहनत को सराहा जा रहा है लेकिन सवाल यह है कि क्या वह इतनी जल्दी एक प्रमुख राजनीतिक ताकत बन पाएंगे?
हाल ही में एक सभा में, पीके के बारे में लोगों की प्रतिक्रियाओं ने इस द्वंद्व को उजागर किया। एक बुजुर्ग किसान ने पीके की पदयात्रा की तारीफ करते हुए कहा, “बाबूजी प्रशांत किशोर की बातें अच्छी हैं और वे मेहनत भी कर रहे हैं। पर ये ‘बजरंगबली हैं क्या कि एकाएक उड़ेंगे?’” उनका इशारा साफ था: राजनीति में विश्वसनीयता और सत्ता तक पहुंचने में समय लगता है।
वोटर्स का मानना है कि पीके ने भले ही कई चुनावों में पार्टियों को जीत दिलाई हो लेकिन खुद का संगठन खड़ा करना एक अलग चुनौती है। उनकी “जन सुराज” पहल को एक अच्छा मंच माना जा रहा है जो स्थानीय मुद्दों और स्वच्छ राजनीति की बात करता है। युवाओं में उनकी बातों को लेकर उत्साह भी लेकिन वे अभी भी एक ठोस राजनीतिक रोडमैप की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
एक कॉलेज छात्रा ने कहा “हम चाहते हैं कि कोई नया विकल्प आए पर पीके को अभी और समय देना होगा। उन्हें यह साबित करना होगा कि यह सिर्फ एक चुनावी स्टंट नहीं बल्कि दीर्घकालिक बदलाव का आंदोलन है।” वोटर्स चाहते हैं कि वह सिर्फ सलाहकार की छवि से बाहर निकलकर एक सफल जननेता के रूप में खुद को स्थापित करें जिसके लिए उन्हें पदयात्रा के बाद भी लोगों के बीच रहकर उनके लिए काम करते रहना होगा।
फिलहाल प्रशांत किशोर और उनकी टीम की कड़ी मेहनत दिखाई दे रही है लेकिन जनता उन्हें तुरंत एक राजनीतिक चमत्कार के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। वोटर्स ने उनकी बात ध्यान से सुनी है पर वे उन्हें और करीब से परखना चाहते हैं। उनकी ‘उड़ान’ की गति जनता के भरोसे और उनकी लगातार सक्रियता पर निर्भर करेगी।