Education Bill नई दिल्ली: उच्च शिक्षा के लिए नियामक और वित्तपोषण को अलग करने के सरकार के फैसले को अधिकारियों ने ‘सचेतन’ कदम बताया है। यह फैसला राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के सुझावों के अनुरूप है जिसका उद्देश्य हितों के टकराव को कम करना है। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 के तहत, उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए अलग-अलग नियामक, मान्यता और मानक परिषदें बनाई जाएंगी। शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि यह फैसला इसलिए लिया गया है ताकि नियामक और वित्तपोषण के बीच हितों का टकराव न हो।
वित्तपोषण की प्रक्रिया
अब तक, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) केंद्रीय विश्वविद्यालयों को अनुदान देता था। लेकिन नए विधेयक के तहत, यह काम शिक्षा मंत्रालय करेगा। मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, “हमने यह फैसला इसलिए लिया है क्योंकि हमें लगता है कि नियामक और वित्तपोषण को अलग करना जरूरी है।”
विरोध और समर्थन
विपक्षी दलों ने इस विधेयक का विरोध किया है उनका कहना है कि यह उच्च शिक्षा के केंद्रीकरण की कोशिश है। लेकिन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि यह विधेयक उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए है।
नए नियामक की भूमिका
नए नियामक, विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान के पास वित्तपोषण की शक्ति नहीं होगी लेकिन यह उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए मानक और मान्यता तय करेगा। यह नियामक उच्च शिक्षा संस्थानों को अनुदान देने के लिए शिक्षा मंत्रालय को सिफारिशें भी करेगा। इस विधेयक को लोकसभा में पेश किया जा चुका है और इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया है।