नई दिल्ली :- डिजिटल युग में जहां एक ओर सुविधाएं बढ़ी हैं वहीं दूसरी ओर निजता यानी प्राइवेसी को लेकर चिंताएं भी गहराती जा रही हैं। अब एक नए प्रावधान को लेकर बहस तेज है जिसके तहत 1 अप्रैल 2026 से टैक्स अधिकारियों को कुछ परिस्थितियों में लोगों के ऑनलाइन डेटा तक पहुंच मिल सकेगी। इस बदलाव को टैक्स चोरी रोकने और काले धन पर लगाम लगाने की दिशा में अहम कदम बताया जा रहा है।
प्रस्तावित नियमों के अनुसार आयकर विभाग को जांच के दौरान डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ी जानकारी देखने का अधिकार मिलेगा। इसमें ईमेल सोशल मीडिया अकाउंट ऑनलाइन बैंकिंग ट्रांजैक्शन और क्लाउड स्टोरेज जैसे डेटा शामिल हो सकते हैं। हालांकि यह अधिकार पूरी तरह से मनमाना नहीं होगा बल्कि तय कानूनी प्रक्रिया और अनुमतियों के तहत ही इस्तेमाल किया जाएगा।
सरकार का तर्क है कि आज के समय में बड़ी मात्रा में वित्तीय लेनदेन ऑनलाइन माध्यमों से हो रहा है। ऐसे में टैक्स चोरी के मामलों की जांच के लिए डिजिटल सबूत बेहद जरूरी हो गए हैं। अधिकारी मानते हैं कि इस व्यवस्था से फर्जी लेनदेन बेनामी संपत्ति और टैक्स बचाने के नए तरीकों पर रोक लगाने में मदद मिलेगी।
वहीं दूसरी ओर प्राइवेसी को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर डेटा एक्सेस के नियम स्पष्ट और पारदर्शी नहीं हुए तो आम नागरिकों की निजता खतरे में पड़ सकती है। डिजिटल अधिकारों से जुड़े लोगों का मानना है कि किसी भी नागरिक के निजी ऑनलाइन डेटा तक पहुंच केवल गंभीर मामलों में और मजबूत निगरानी के साथ ही दी जानी चाहिए।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि आम ईमानदार टैक्सपेयर्स को घबराने की जरूरत नहीं है। यह कदम केवल संदिग्ध मामलों में जांच के लिए होगा। इसके साथ ही डेटा सुरक्षा और दुरुपयोग रोकने के लिए सख्त प्रावधान बनाए जाएंगे।
कुल मिलाकर यह बदलाव टैक्स सिस्टम को मजबूत करने की कोशिश है लेकिन इसके साथ डिजिटल प्राइवेसी और नागरिक अधिकारों के संतुलन पर नजर रखना भी उतना ही जरूरी होगा।