मुंबई(महाराष्ट्र):- महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। ठाकरे बंधुओं के साथ आने की औपचारिक घोषणा से पहले ही महाविकास आघाड़ी में अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। गठबंधन के भीतर बढ़ती असहजता ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले चुनाव आसान नहीं होने वाले हैं। खास तौर पर कांग्रेस ने मुंबई में अपने दम पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर सभी सहयोगी दलों को चौंका दिया है। इस फैसले को कांग्रेस की नई राजनीतिक दिशा के रूप में देखा जा रहा है।
कांग्रेस अब केवल पुराने गठबंधन पर निर्भर नहीं रहना चाहती। पार्टी ने नए सहयोगियों की तलाश शुरू कर दी है और इसी कड़ी में प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी के साथ चुनावी समझौते का फैसला लिया गया है। वंचित बहुजन आघाड़ी को साठ सीटों का प्रस्ताव देकर कांग्रेस ने साफ संकेत दे दिया है कि वह दलित और वंचित वर्ग के वोट बैंक को मजबूती से अपने पक्ष में लाना चाहती है। यह कदम सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
इस रणनीति का असर महाविकास आघाड़ी के अन्य घटक दलों पर भी पड़ सकता है। शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भीतर भी इस फैसले को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। कई नेताओं का मानना है कि अलग अलग रास्ते अपनाने से विपक्षी वोटों का बंटवारा हो सकता है। वहीं कांग्रेस का तर्क है कि मजबूत क्षेत्रीय गठजोड़ से वह अपनी खोई हुई जमीन वापस हासिल कर सकती है।
आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति और अधिक दिलचस्प होने वाली है। नए गठबंधन पुराने रिश्तों की परीक्षा लेंगे और मतदाता तय करेंगे कि किस रणनीति में दम है। इतना तय है कि इस बार का चुनाव केवल सीटों की लड़ाई नहीं बल्कि नेतृत्व और भरोसे की भी बड़ी कसौटी साबित होगा।