Vaccine Pipeline नई दिल्ली:- भारत में वैक्सीन सुरक्षा की यात्रा 2005 में AEFI (टीकाकरण के बाद प्रतिकूल घटनाएं) गाइडलाइंस के साथ शुरू हुई जिसे 2010 और 2015 में संशोधित किया गया। 2017 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस प्रणाली को मजबूत माना। COVID-19 के दौरान बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान ने इस प्रणाली का परीक्षण किया जिसके परिणामस्वरूप 2024 में गाइडलाइंस का पुनरीक्षण किया गया। नए फ्रेमवर्क में बच्चों से लेकर वयस्कों और आपातकालीन उपयोग के लिए टीकों की निगरानी को व्यापक बनाया गया है।
वैक्सीन पाइपलाइन की प्रक्रिया
वैक्सीन पाइपलाइन में कई चरण होते हैं:
1. शोध और विकास: वैज्ञानिक वैक्सीन के उम्मीदवारों की पहचान करते हैं और उनकी सुरक्षा और प्रभावकारिता का मूल्यांकन करते हैं।
2. प्रिक्लिनिकल परीक्षण: वैक्सीन का परीक्षण जानवरों पर किया जाता है ताकि उनकी सुरक्षा और प्रभावकारिता का आकलन किया जा सके।
3. क्लिनिकल परीक्षण: वैक्सीन का परीक्षण मानवों पर किया जाता है जिसमें तीन चरण होते हैं – फेज I, फेज II और फेज III।
4. लाइसेन्सिंग और अप्रूवल: वैक्सीन को नियामक अधिकारियों द्वारा लाइसेन्स और अप्रूवल दिया जाता है।
5. पोस्ट-मार्केटिंग निगरानी: वैक्सीन की सुरक्षा और प्रभावकारिता की निगरानी की जाती है।
वैक्सीन सुरक्षा की निगरानी
भारत में वैक्सीन सुरक्षा की निगरानी के लिए कई प्रणालियां हैं:
1. AEFI: टीकाकरण के बाद प्रतिकूल घटनाओं की निगरानी।
2. VAERS: वैक्सीन के बाद प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्टिंग।
3. VSD: वैक्सीन सुरक्षा डाटालिंक ।