Stem cell /नई दिल्ली:- सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) के लिए स्टेम सेल थेरेपी को क्लिनिकल सेवा के रूप में नहीं दिया जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि स्टेम सेल थेरेपी का उपयोग केवल अनुमोदित और निगरानी वाले क्लिनिकल ट्रायल या अनुसंधान सेटिंग में ही किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि स्टेम सेल थेरेपी के प्रभाव और सुरक्षा के बारे में स्थापित वैज्ञानिक प्रमाणों की कमी है, इसलिए डॉक्टर अपने मरीजों को पर्याप्त जानकारी नहीं दे सकते हैं। न्यायालय ने कहा कि यह चिकित्सकों की जिम्मेदारी है कि वे अपने मरीजों को उपचार के बारे में पर्याप्त जानकारी दें और उनकी सहमति लें। न्यायालय ने केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि सरकार ने स्टेम सेल थेरेपी के प्रचार और प्रशासन के खिलाफ कार्रवाई नहीं की है, जिससे एएसडी से पीड़ित बच्चों के माता-पिता को भारी वित्तीय नुकसान हो रहा है। न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह स्टेम सेल अनुसंधान के लिए एक नियामक प्राधिकरण का गठन करे।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हुए चिकित्सा विशेषज्ञों ने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण फैसला है जो मरीजों की सुरक्षा और चिकित्सा नैतिकता को सुनिश्चित करेगा। उन्होंने कहा कि स्टेम सेल थेरेपी का उपयोग केवल अनुमोदित और निगरानी वाले क्लिनिकल ट्रायल में ही किया जाना चाहिए। इस फैसले के बाद सरकार को स्टेम सेल अनुसंधान के लिए एक नियामक प्राधिकरण का गठन करना होगा और स्टेम सेल थेरेपी के प्रचार और प्रशासन के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी। यह फैसला मरीजों की सुरक्षा और चिकित्सा नैतिकता को सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।