नई दिल्ली :- भ्रष्टाचार से जुड़े एक कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट में तीखी टिप्पणी सामने आई है। सुनवाई के दौरान अदालत के एक जज ने इस कानून को लेकर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा कि यह व्यवस्था भ्रष्ट लोगों को बचाने का माध्यम बन रही है। जज की इस टिप्पणी के बाद न्यायिक और राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। अब यह पूरा मामला देश के मुख्य न्यायाधीश के सामने रखे जाने की तैयारी है।
सुनवाई के दौरान जज ने कहा कि कानून का मूल उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों और नागरिकों की रक्षा करना होना चाहिए लेकिन मौजूदा प्रावधानों का इस्तेमाल भ्रष्टाचार के आरोपों से बचने के लिए किया जा रहा है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि जांच और अभियोजन की प्रक्रिया में अनावश्यक अड़चनें डालकर दोषियों को फायदा पहुंचाया जा रहा है। इस तरह की व्यवस्था से आम जनता का न्याय प्रणाली पर भरोसा कमजोर होता है।
जज ने सवाल उठाया कि जब किसी के खिलाफ गंभीर आरोप हों और प्रथम दृष्टया सबूत भी मौजूद हों तो जांच शुरू करने के लिए इतनी जटिल अनुमति प्रक्रिया क्यों रखी गई है। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार जैसे गंभीर अपराधों में देरी खुद में अन्याय के समान है। अदालत की इस टिप्पणी को मौजूदा कानून पर बड़ा सवाल माना जा रहा है।
अब यह मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाएगा ताकि इस पर व्यापक विचार हो सके। संभावना है कि एक बड़ी बेंच इस कानून की संवैधानिकता और इसके व्यावहारिक प्रभावों की समीक्षा कर सकती है। यदि ऐसा होता है तो आने वाले समय में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की दिशा बदल सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी संकेत देती है कि अदालत भ्रष्टाचार के मामलों में किसी भी तरह की ढील के पक्ष में नहीं है। यदि कानून में खामियां पाई जाती हैं तो उनमें बदलाव या नई व्याख्या संभव है। कुल मिलाकर यह मामला न केवल न्याय व्यवस्था बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए भी बेहद अहम माना जा रहा है।