नई दिल्ली :- भारत के गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बनना किसी भी विदेशी नेता के लिए सम्मान की बात मानी जाती है। यह केवल औपचारिक निमंत्रण नहीं बल्कि भारत की ओर से भरोसे और मित्रता का प्रतीक होता है। लेकिन इतिहास में एक ऐसा भी उदाहरण है जब गणतंत्र दिवस पर भारत की मेहमाननवाजी पाने वाला देश कुछ ही सालों बाद भारत के खिलाफ युद्ध के मैदान में उतर आया।
यह मामला चीन से जुड़ा है। वर्ष 1954 में चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन लाई भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि बनकर आए थे। उस समय भारत और चीन के रिश्ते मैत्री और भाईचारे के प्रतीक माने जाते थे। हिंदी चीनी भाई भाई जैसे नारे गूंजते थे और दोनों देशों के बीच पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। चाउ एन लाई की मौजूदगी ने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत और चीन एशिया में शांति और सहयोग की नई इबारत लिखेंगे।
लेकिन उस यात्रा के दौरान चीन ने केवल समारोह में भाग नहीं लिया बल्कि भारत की सैन्य परेड और सुरक्षा व्यवस्था को भी बारीकी से देखा। राजपथ पर हुई परेड में भारतीय थल सेना नौसेना और वायु सेना की ताकत का प्रदर्शन हुआ। उस समय भारत को शायद अंदाजा नहीं था कि यही निरीक्षण भविष्य में उसके खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा।
चार साल बाद परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी थीं। वर्ष 1962 में चीन ने अचानक भारत पर हमला कर दिया। सीमा विवाद को लेकर शुरू हुआ यह युद्ध भारत के लिए बड़ा झटका साबित हुआ। जिस देश को मित्र समझा गया था उसी ने पीठ में छुरा घोंप दिया। युद्ध ने भारत की रणनीतिक सोच और रक्षा नीति को झकझोर कर रख दिया।
इस घटना से भारत ने कड़ा सबक सीखा। इसके बाद देश ने अपनी सैन्य तैयारियों पर विशेष ध्यान देना शुरू किया और आत्मनिर्भर रक्षा व्यवस्था की दिशा में कदम बढ़ाए। आज जब भारत अपनी सैन्य ताकत और कूटनीतिक संतुलन के लिए जाना जाता है तो इसके पीछे ऐसे ही ऐतिहासिक अनुभव छिपे हैं।
गणतंत्र दिवस का यह प्रसंग याद दिलाता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में केवल मित्रता के शब्द नहीं बल्कि सतर्कता और रणनीति भी उतनी ही जरूरी होती है। इतिहास ने सिखाया है कि सम्मान के साथ सावधानी भी जरूरी है।