बालेन शाह ने भारत नेपाल सीमा विवाद को लेकर छेड़ी नई बहस

नेपाल :- नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के हालिया बयान ने भारत-नेपाल सीमा विवाद को लेकर नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा है कि सीमा विवाद को केवल इस नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए कि भारत ने नेपाल की जमीन पर कब्जा किया है, बल्कि नेपाल ने भी कुछ स्थानों पर भारतीय भूमि पर अतिक्रमण किया है। उनके इस बयान के बाद नेपाल की राजनीति और कूटनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।

बालेन शाह ने कहा कि भारत और नेपाल के बीच सीमा से जुड़े मुद्दों का समाधान तथ्यों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि सीमा विवाद के समाधान के लिए विशेषज्ञों की मदद ली जानी चाहिए ताकि दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों का स्थायी समाधान निकाला जा सके।

 

नेपाल में विपक्षी दलों और कई राजनीतिक नेताओं ने प्रधानमंत्री के इस बयान पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि नेपाल लगातार कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे क्षेत्रों पर अपना दावा करता रहा है, ऐसे में प्रधानमंत्री का यह बयान देश की आधिकारिक स्थिति को कमजोर कर सकता है। कई नेताओं ने इसे राष्ट्रीय हितों के खिलाफ बताया है।

 

भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद कोई नया मुद्दा नहीं है। दोनों देशों के बीच विशेष रूप से कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्र को लेकर लंबे समय से मतभेद रहे हैं। वर्ष 2020 में नेपाल द्वारा नया राजनीतिक नक्शा जारी किए जाने के बाद यह विवाद और अधिक चर्चा में आया था।

 

विशेषज्ञों का मानना है कि बालेन शाह का बयान पारंपरिक राजनीतिक रुख से अलग नजर आता है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि वह सीमा विवाद को भावनात्मक मुद्दे के बजाय व्यावहारिक और तथ्यात्मक दृष्टिकोण से देखने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि आलोचकों का मानना है कि ऐसे बयान कूटनीतिक स्तर पर नेपाल की स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं।

 

इस बयान के बाद नेपाल में राजनीतिक बहस तेज हो गई है और सोशल मीडिया पर भी लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। वहीं भारत की ओर से फिलहाल इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा नेपाल की घरेलू राजनीति और भारत-नेपाल संबंधों दोनों में चर्चा का विषय बना रह सकता है। सीमा विवाद पर दोनों देशों के बीच संवाद और कूटनीतिक बातचीत को ही समाधान का सबसे प्रभावी रास्ता माना जा रहा है।

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