Supreme Court (नई दिल्ली):- सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को ‘वंदे मातरम्’ को लेकर एक बेहद अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि जो लोग अपनी अंतरात्मा या अपने संवैधानिक अधिकारों के आधार पर वंदे मातरम् गाने से इनकार करते हैं, उन्हें इसके लिए आपराधिक सजा नहीं दी जानी चाहिए।
जस्टिस की बेंच ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि राष्ट्र के प्रतीकों का सम्मान जरूरी है, लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अंतरात्मा की आवाज का भी उतना ही सम्मान होना चाहिए।
Supreme Court: क्या है मामला?
दरअसल, देश में कई बार स्कूलों, सरकारी कार्यक्रमों और सार्वजनिक स्थलों पर वंदे मातरम् गाने को अनिवार्य करने की मांग उठती रही है। कुछ याचिकाओं में इसे न गाने वालों पर कार्रवाई की मांग भी की गई थी। इसी पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह संतुलित टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा कि देशभक्ति दिल से आनी चाहिए, डर से नहीं। अगर कोई व्यक्ति अपनी धार्मिक मान्यता या अंतरात्मा के कारण वंदे मातरम् नहीं गाना चाहता, तो उसे अपराधी नहीं बनाया जा सकता।
यह टिप्पणी 1986 के बिजो इमैनुएल केस की याद दिलाती है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि Jehovah’s Witness समुदाय के बच्चों को राष्ट्रगान न गाने पर स्कूल से नहीं निकाला जा सकता।
Supreme Court: आपकी राय क्या है?
1. हर व्यक्ति की अंतरात्मा की स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए।
2. राष्ट्र सम्मान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में संतुलन जरूरी है।
3. देश के प्रतीकों के सम्मान में समझौता नहीं होना चाहिए।