Delhi Hospital: (नई दिल्ली)। राजधानी दिल्ली के एक निजी अस्पताल में डॉक्टरों ने दुर्लभ कैंसर से जूझ रहे केन्या के 38 वर्षीय मरीज की जटिल सर्जरी कर उसके फेफड़े के स्वस्थ हिस्से को बचाने में सफलता हासिल की। करीब सात घंटे तक चले ऑपरेशन में डॉक्टरों ने ट्यूमर को हटाया, लेकिन पूरा बायां फेफड़ा निकालने की नौबत नहीं आने दी। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्यूमर फेफड़े के ऊपरी हिस्से में गहराई तक मौजूद था और सांस की मुख्य नली के साथ फेफड़े को रक्त पहुंचाने वाली एक प्रमुख रक्त वाहिका को भी प्रभावित कर रहा था।
मरीज की पहचान मोहम्मद यूनिस गुलिये के रूप में हुई है। उन्हें एडेनॉइड सिस्टिक कार्सिनोमा नाम का दुर्लभ कैंसर था। अस्पताल की जानकारी के मुताबिक, ट्यूमर की जटिल स्थिति के कारण केन्या में कई डॉक्टरों से परामर्श लेने के बावजूद उसकी सही प्रकृति का पता लगाना मुश्किल हो रहा था। बाद में दिल्ली में उनकी सर्जरी की गई।
क्या है एडेनॉइड सिस्टिक कार्सिनोमा?
Delhi Hospital: एडेनॉइड सिस्टिक कार्सिनोमा (Adenoid Cystic Carcinoma) कैंसर का एक दुर्लभ प्रकार है, जो आम तौर पर ग्रंथियों से जुड़े ऊतकों में विकसित होता है। फेफड़े या श्वसन मार्ग में इसका पाया जाना असामान्य है। चिकित्सा साहित्य के अनुसार, फेफड़े का प्राथमिक एडेनॉइड सिस्टिक कार्सिनोमा बेहद दुर्लभ माना जाता है और इसके उपचार की योजना ट्यूमर की जगह, फैलाव तथा मरीज की स्थिति के आधार पर बनाई जाती है।
मोहम्मद यूनिस के मामले में ट्यूमर बाएं फेफड़े के ऊपरी हिस्से में गहराई तक मौजूद था। इसकी स्थिति के कारण सर्जरी में केवल ट्यूमर हटाना ही चुनौती नहीं थी, बल्कि सांस की नली और रक्त वाहिका के प्रभावित हिस्सों को संभालना भी जरूरी था।
सात घंटे चला ऑपरेशन, फेफड़े का स्वस्थ हिस्सा बचाने पर जोर
Delhi Hospital: रिपोर्ट के मुताबिक, डॉक्टरों ने सर्जरी के दौरान ट्यूमर को हटाते हुए फेफड़े के निचले हिस्से को सुरक्षित रखने का प्रयास किया। इस तरह पूरे फेफड़े को निकालने के बजाय प्रभावित हिस्से पर केंद्रित ऑपरेशन किया गया।
ऐसी सर्जरी में डॉक्टरों के सामने कैंसरग्रस्त ऊतक को हटाने के साथ-साथ शेष फेफड़े की कार्यक्षमता बनाए रखने की चुनौती होती है। सांस की नली और रक्त वाहिका जैसे महत्वपूर्ण हिस्सों के प्रभावित होने पर ऑपरेशन की जटिलता और बढ़ जाती है।
Delhi Hospital: अस्पताल की ओर से उपलब्ध जानकारी में बताया गया कि ट्यूमर के साथ प्रभावित संरचनाओं का उपचार और पुनर्निर्माण किया गया, ताकि फेफड़े के बचे हुए हिस्से में हवा और रक्त का प्रवाह बहाल हो सके।
लगातार सीने में दर्द और खांसी के साथ निकलता था खून
Delhi Hospital: मोहम्मद यूनिस को लंबे समय से बाईं ओर सीने में दर्द की शिकायत थी। इसके साथ उन्हें कभी-कभी खांसी के दौरान खून भी आता था। इन लक्षणों के कारण वह परेशान थे और उन्होंने केन्या में कई डॉक्टरों से सलाह ली।
हालांकि, ट्यूमर की असामान्य और गहरी स्थिति के कारण उसकी सही पहचान करना आसान नहीं था। ऐसे मामलों में बीमारी का पता लगाने के लिए विशेषज्ञ जांच और इमेजिंग के साथ अन्य आवश्यक परीक्षणों की जरूरत पड़ सकती है। मरीज के मामले में दिल्ली के अस्पताल में जांच के बाद दुर्लभ कैंसर की पहचान हुई और सर्जरी का रास्ता अपनाया गया।
पूरा फेफड़ा निकालने से बचाना क्यों अहम है?
Delhi Hospital: फेफड़ों की सर्जरी में कैंसरग्रस्त हिस्से को हटाने के साथ स्वस्थ ऊतक को बचाने का निर्णय मरीज की स्थिति और ट्यूमर के फैलाव पर निर्भर करता है। जहां चिकित्सकीय रूप से संभव हो, वहां फेफड़े के स्वस्थ हिस्से को सुरक्षित रखने से शेष फेफड़े की कार्यक्षमता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, हर मरीज के लिए एक ही तरह की सर्जरी उपयुक्त नहीं होती। ऑपरेशन का तरीका कैंसर की प्रकृति, उसकी सीमा, आसपास की संरचनाओं पर असर और मरीज की समग्र सेहत को ध्यान में रखकर तय किया जाता है।
सर्जरी के बाद मरीज की स्थिति
Delhi Hospital: मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ऑपरेशन के बाद मरीज को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी। हालांकि, कैंसर के इलाज में सर्जरी के बाद की निगरानी और आगे की उपचार योजना भी महत्वपूर्ण होती है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट नहीं है कि मरीज के लिए आगे किसी अतिरिक्त उपचार की सिफारिश की गई है या नहीं।
यह मामला दिखाता है कि दुर्लभ और जटिल बीमारियों में सही जांच, विशेषज्ञों की राय और बीमारी के अनुसार उपचार की योजना कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। साथ ही, फेफड़े के स्वस्थ हिस्से को बचाने का निर्णय तभी लिया जाता है जब डॉक्टरों के आकलन में ऐसा करना सुरक्षित और उपयुक्त हो।
Delhi Hospital: निष्कर्ष: दिल्ली में केन्या के मरीज की सात घंटे चली जटिल सर्जरी में डॉक्टरों ने दुर्लभ कैंसर का ट्यूमर हटाते हुए फेफड़े के स्वस्थ हिस्से को बचाने का प्रयास किया। यह मामला दुर्लभ कैंसर के इलाज में विशेषज्ञ चिकित्सा और मरीज के अनुसार उपचार तय करने के महत्व को सामने लाता है।