Delhi High Court: दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला: गोद लेने के मामले में CARA की प्रक्रियागत खामियों पर सवाल
(नई दिल्ली): दिल्ली हाईकोर्ट ने सिंगापुर में रहने वाले एक दंपती की बच्ची को गोद लेने से जुड़ी याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) की कार्यप्रणाली में गंभीर प्रक्रियागत खामियों की ओर ध्यान दिलाते हुए भविष्य में ऐसी गलतियों को रोकने के लिए कई निर्देश दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी बच्चे का रेफरल स्वीकार कर लेने या उससे भावनात्मक जुड़ाव हो जाने मात्र से संभावित दत्तक माता-पिता को उसे गोद लेने का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता।
क्या है पूरा मामला?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सिंगापुर में रहने वाले दंपती ने CARA के पोर्टल पर संभावित दत्तक माता-पिता के रूप में पंजीकरण कराया था। जनवरी 2026 में प्राधिकरण ने उन्हें एक बच्ची का रेफरल दिया, जिसे दंपती ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने बच्ची को गोद लेने की प्रक्रिया पूरी करने के लिए आवश्यक दस्तावेज जमा किए और अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) जारी करने का अनुरोध किया।
हालांकि, बाद में CARA ने दंपती की पात्रता से जुड़ी आपत्ति के आधार पर आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद दंपती ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। उनका पक्ष था कि जब प्राधिकरण ने दस्तावेजों की जांच के बाद बच्ची का रेफरल दिया था और आवेदन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई थी, तो बाद में आवेदन अस्वीकार करना उचित नहीं था।
Delhi High Court: दो बच्चों वाले दंपती की पात्रता पर क्या कहा अदालत ने?
रिपोर्टों के मुताबिक, मामले में दंपती के पहले से दो जैविक बच्चे हैं। अदालत के समक्ष CARA की ओर से दलील दी गई कि दत्तक ग्रहण विनियम, 2022 के विनियम 5(7) के तहत दो या अधिक बच्चों वाले दंपती को सामान्य श्रेणी के बच्चे के बजाय विशेष जरूरतों वाले बच्चों और ऐसे बच्चों को गोद लेने के लिए विचार किया जा सकता है जिन्हें गोद लेने के लिए उपयुक्त परिवार मिलने में कठिनाई होती है।
अदालत ने माना कि यदि संभावित दत्तक माता-पिता निर्धारित कानूनी शर्तों के तहत पात्र नहीं हैं, तो केवल रेफरल स्वीकार करने या आवेदन की प्रक्रिया आगे बढ़ने से उन्हें गोद लेने का अधिकार नहीं मिल जाता। इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई।
CARA को प्रक्रिया सुधारने के निर्देश
याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने CARA की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए कई निर्देश जारी किए। अदालत ने कहा कि संभावित दत्तक माता-पिता की पात्रता का सत्यापन पंजीकरण के समय, होम स्टडी रिपोर्ट के पुनः सत्यापन और बच्चे का रेफरल जारी करने से पहले किया जाना चाहिए।
अदालत ने पोर्टल के माइग्रेशन के दौरान अपडेट किए गए प्रोफाइल की जांच करने और आवेदन की स्थिति को सही तरीके से दर्ज करने पर भी जोर दिया। निर्देशों के अनुसार, किसी आवेदन को ‘वापस लिया गया’ तभी दर्ज किया जाना चाहिए, जब संबंधित आवेदक ने वास्तव में उसे वापस लिया हो। साथ ही, NOC से जुड़े आवेदनों का निपटारा निर्धारित समयसीमा में करने और देरी के कारण स्पष्ट दर्ज करने की आवश्यकता बताई गई।
Delhi High Court: बच्ची के हित को प्राथमिकता
अदालत ने बच्ची के हित को दत्तक ग्रहण प्रक्रिया का प्रमुख आधार बताया। रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने अंतरिम आदेश हटाते हुए बच्ची को कानून के अनुसार गोद दिए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए CARA को तत्काल कदम उठाने का निर्देश दिया।
इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया में भावनात्मक पहलू महत्वपूर्ण होने के बावजूद कानूनी पात्रता और निर्धारित नियमों का पालन अनिवार्य है। साथ ही, प्राधिकरण की जिम्मेदारी है कि रेफरल देने से पहले सभी जरूरी जांच पूरी करे, ताकि बाद में बच्चे और संभावित दत्तक परिवार दोनों को अनिश्चितता का सामना न करना पड़े।
स्रोत: ANI की रिपोर्ट तथा मामले से संबंधित मीडिया रिपोर्टें।