नाबालिग से दुष्कर्म मामले में आसाराम को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं

नई दिल्ली :- नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे आसाराम को एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत नहीं मिल सकी। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि उनकी जमानत याचिका पर विचार केवल उसी स्थिति में किया जाएगा जब उनकी स्वास्थ्य स्थिति अत्यंत गंभीर हो जाए या उनके जीवन पर वास्तविक खतरा उत्पन्न हो। अदालत ने इस मामले में राजस्थान सरकार से भी जवाब मांगा है।

 

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी दोषी को केवल सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि मेडिकल आधार पर जमानत देने के लिए यह साबित होना आवश्यक है कि जेल के भीतर उचित उपचार संभव नहीं है और जीवन को गंभीर खतरा बना हुआ है। न्यायालय ने साफ किया कि वह केवल असाधारण परिस्थितियों में ही इस तरह की मांग पर विचार करेगा।

 

आसाराम की ओर से दायर याचिका में बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का हवाला देते हुए जमानत देने की मांग की गई थी। बचाव पक्ष का कहना था कि लगातार चिकित्सकीय निगरानी की आवश्यकता है और जेल में पर्याप्त इलाज उपलब्ध नहीं है। दूसरी ओर राज्य सरकार ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि कानून के अनुसार दोषी को राहत देने के लिए केवल स्वास्थ्य संबंधी सामान्य दलील पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।

 

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को इस मामले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अदालत ने यह संदेश दिया है कि गंभीर अपराधों में दोषसिद्ध व्यक्तियों को चिकित्सा आधार पर जमानत देने के लिए सख्त मानकों का पालन किया जाएगा। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में मेडिकल रिपोर्ट यह साबित करती है कि स्थिति अत्यंत गंभीर है और जान को वास्तविक खतरा है तब ही इस पहलू पर विस्तार से विचार किया जाएगा।

 

गौरतलब है कि आसाराम नाबालिग से दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे हैं। इससे पहले भी उन्होंने कई बार स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर अदालतों से राहत मांगी थी। कुछ अवसरों पर उन्हें सीमित अवधि के लिए चिकित्सकीय आधार पर अंतरिम राहत मिली थी जबकि कई बार अदालतों ने उनकी याचिकाओं को खारिज भी किया।

 

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य के ऐसे मामलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संकेत है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मेडिकल आधार पर जमानत कोई सामान्य अधिकार नहीं है बल्कि यह केवल असाधारण परिस्थितियों में दिया जाने वाला विशेष राहत का उपाय है। इससे यह भी सुनिश्चित होगा कि गंभीर अपराधों में सजा पाए दोषियों की जमानत याचिकाओं पर समान और सख्त कानूनी मानकों के अनुसार फैसला लिया जाए।

 

अब इस मामले में सभी की नजर राजस्थान सरकार की ओर से दाखिल किए जाने वाले जवाब और आगामी सुनवाई पर रहेगी। यदि भविष्य में प्रस्तुत मेडिकल रिपोर्ट में यह साबित होता है कि आसाराम की स्वास्थ्य स्थिति अत्यंत गंभीर है और उनके जीवन पर वास्तविक खतरा मंडरा रहा है तभी सुप्रीम कोर्ट उनकी जमानत याचिका पर आगे विचार करेगा। फिलहाल अदालत के रुख से स्पष्ट है कि केवल स्वास्थ्य संबंधी सामान्य दलीलों के आधार पर राहत मिलने की संभावना नहीं है।

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