Lata Mangeshkar: 47 साल बाद भी दिल छू जाता है लता मंगेशकर का ये छठ गीत, घाट पर बजते ही आंखें हो जाती हैं नम

Lata Mangeshkar:- छठ पूजा का नाम आते ही आस्था, भक्ति और लोकगीतों की मधुर धुनें मन में उतरने लगती हैं। लेकिन जब सुरों की मल्लिका लता मंगेशकर की आवाज इस आस्था से जुड़ जाए, तो गीत सिर्फ गीत नहीं रहता, बल्कि लोगों की भावनाओं का हिस्सा बन जाता है। ऐसा ही एक भोजपुरी छठ गीत करीब 47 साल बाद भी लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाए हुए है।

लता मंगेशकर की सुरीली आवाज में गाया गया ‘मेरे माथे का सिंदूर’ छठ पर्व के दौरान बिहार और पूर्वांचल के कई इलाकों में आज भी सुनाई देता है। गीत की भावनात्मक प्रस्तुति और भक्ति से जुड़ी संवेदनाएं इसे खास बनाती हैं।

Lata Mangeshkar: लता की आवाज में छठ की भक्ति

छठ पूजा बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और देश के दूसरे हिस्सों में बेहद श्रद्धा के साथ मनाया जाने वाला पर्व है। इस दौरान घाटों पर पारंपरिक गीतों के साथ ऐसे भक्ति गीत भी सुनाई देते हैं, जो पीढ़ियों से लोगों की भावनाओं से जुड़े हुए हैं।

लता मंगेशकर का यह गीत भी इसी विरासत का हिस्सा बन चुका है। उनकी आवाज की मिठास और गीत के भाव मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं कि छठ घाट पर मौजूद श्रद्धालु भावुक हो उठते हैं।

Lata Mangeshkar: 47 साल बाद भी क्यों खास है ये गीत?

समय के साथ संगीत की दुनिया में बड़े बदलाव आए हैं। नए कलाकार, नए संगीत और नए तरह के भक्ति गीत सामने आए, लेकिन कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनकी लोकप्रियता समय के साथ कम होने के बजाय और मजबूत होती जाती है।

लता मंगेशकर की आवाज में गाया गया यह गीत भी ऐसी ही यादगार रचनाओं में शामिल है। गीत में छठी मइया के प्रति आस्था के साथ परिवार और सुहाग से जुड़ी भावनाओं को बेहद मार्मिक तरीके से पेश किया गया है।

यही वजह है कि पुराने श्रोता इसे सुनकर अपनी पुरानी यादों में लौट जाते हैं, जबकि नई पीढ़ी भी इस गीत को छठ पूजा के माहौल में सुनना पसंद करती है।

Lata Mangeshkar: छठ घाट पर आज भी सुनाई देती है आवाज

छठ के दौरान जब शाम के समय घाटों पर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और चारों तरफ दीपों की रोशनी दिखाई देती है, उस माहौल में ऐसे गीतों का असर और भी गहरा हो जाता है।

लता मंगेशकर की आवाज में मौजूद भावनात्मक गहराई गीत को सामान्य भक्ति गीतों से अलग पहचान देती है। यही कारण है कि दशकों बाद भी यह गीत छठ पर्व की संगीत परंपरा में अपनी जगह बनाए हुए है।

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Lata Mangeshkar: संगीत और आस्था का अनोखा संगम

छठ पूजा सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि बिहार और पूर्वांचल की सांस्कृतिक पहचान का भी अहम हिस्सा है। इस पर्व से जुड़े गीतों में लोकजीवन, परिवार, प्रकृति और आस्था की झलक मिलती है।

ऐसे में लता मंगेशकर जैसी महान गायिका की आवाज में छठ गीत का लोकप्रिय होना इस बात का उदाहरण है कि संगीत भाषा और समय की सीमाओं से कहीं आगे जाकर लोगों के दिलों को जोड़ सकता है।

आज जब छठ का पर्व नजदीक आता है, तो घाटों और घरों में बजने वाले पुराने गीतों के बीच लता मंगेशकर की आवाज भी सुनाई देती है। यही इस गीत की सबसे बड़ी खूबसूरती है कि 47 साल बाद भी इसकी भावनाएं उतनी ही ताजा महसूस होती हैं।

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