Kasturirangan Report (बेंगलुरु): पश्चिमी घाट को पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने से जुड़े कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के मुद्दे पर कर्नाटक में एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। कांग्रेस विधायक और कर्नाटक के मुख्यमंत्री के कानूनी सलाहकार एएस पोनन्ना ने कहा कि राज्य में इस रिपोर्ट के खिलाफ विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच व्यापक सहमति है। उन्होंने पश्चिमी घाट के संरक्षण की जरूरत को स्वीकार करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय लोगों की आजीविका और क्षेत्र की जमीनी परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
पोनन्ना ने मांग की कि पश्चिमी घाट की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए नए सिरे से वैज्ञानिक और जमीनी अध्ययन कराया जाए। उनके अनुसार, ऐसे क्षेत्रों को पर्यावरणीय सुरक्षा के दायरे में लाने से पहले यह देखा जाना चाहिए कि वहां कौन से गांव बसे हैं, कितनी कृषि भूमि है और कितने लोग खेती तथा बागान गतिविधियों पर निर्भर हैं।
Kasturirangan Report: पश्चिमी घाट को जैव विविधता हॉटस्पॉट बताया
पोनन्ना ने पश्चिमी घाट को महत्वपूर्ण जैव विविधता क्षेत्र बताते हुए इसके संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संरक्षण जरूरी है, लेकिन इसे स्थानीय समुदायों की आजीविका के साथ संतुलित तरीके से लागू किया जाना चाहिए। खास तौर पर किसान और प्लांटेशन क्षेत्र से जुड़े लोगों के हितों को ध्यान में रखने की मांग की गई है।
पश्चिमी घाट भारत के सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्रों में शामिल है। कस्तूरीरंगन समिति ने अपनी रिपोर्ट में पश्चिमी घाट के करीब 59,940 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) के रूप में चिन्हित करने की सिफारिश की थी। प्रस्तावित क्षेत्र छह राज्यों में फैला है और इसमें कर्नाटक का हिस्सा भी शामिल है।
Kasturirangan Report: खेती और बागान क्षेत्र को लेकर चिंता
कर्नाटक में रिपोर्ट को लेकर मुख्य चिंता उन इलाकों को लेकर है जहां लोग लंबे समय से खेती, कॉफी, सुपारी और अन्य बागान गतिविधियों पर निर्भर हैं। राज्य सरकार और स्थानीय प्रतिनिधियों का कहना है कि प्राकृतिक जंगलों और आबादी वाले कृषि क्षेत्रों को एक ही नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
पोनन्ना ने भी इसी मुद्दे को उठाते हुए कहा कि वैज्ञानिक विशेषज्ञों को जमीनी स्तर पर जाकर वास्तविक स्थिति का अध्ययन करना चाहिए। उनका कहना है कि संरक्षण की ऐसी व्यवस्था तैयार होनी चाहिए जिसमें पश्चिमी घाट की जैव विविधता की सुरक्षा के साथ स्थानीय लोगों की कृषि और जीवनशैली प्रभावित न हो।
कर्नाटक सरकार ने जताई है आपत्ति
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट को लेकर कर्नाटक सरकार पहले भी कई बार अपनी आपत्ति केंद्र के सामने रख चुकी है। हाल में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने पश्चिमी घाट में जंगल और कृषि भूमि के बीच अंतर स्पष्ट करने के लिए ड्रोन आधारित LiDAR और प्लॉट-स्तरीय मैपिंग का सुझाव दिया है। राज्य को केंद्र सरकार की ओर से जारी ताजा मसौदे पर 27 सितंबर 2026 तक अपना पक्ष रखना है।
कर्नाटक की आपत्तियों के बीच केंद्र सरकार की ओर से पश्चिमी घाट के पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर अधिसूचना प्रक्रिया जारी है। ऐसे में राज्य में इस विषय पर राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चा आगे भी जारी रहने की संभावना है।
फिलहाल पोनन्ना की मांग का केंद्र बिंदु यह है कि पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए किसी भी अंतिम निर्णय से पहले वैज्ञानिक आधार पर नया जमीनी अध्ययन किया जाए। इस अध्ययन में पर्यावरणीय संवेदनशीलता के साथ स्थानीय आबादी, कृषि और बागान गतिविधियों की वास्तविक स्थिति को भी शामिल करने की बात कही गई है।