Karnataka FDA: महंगी दवाओं की लैंडिंग कॉस्ट और MRP में भारी अंतर, कर्नाटक ने केंद्र से मांगी दखल; 52 गुना तक का फर्क सामने आया

Karnataka FDA (बेंगलुरु): कर्नाटक सरकार ने महंगी दवाओं, कैंसर की दवाओं, मेडिकल डिवाइस और अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले कंज्यूमेबल्स की कीमतों को लेकर केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है। राज्य के खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग की जांच में कुछ उत्पादों की संस्थागत खरीद कीमत यानी लैंडिंग कॉस्ट और उनके अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच काफी बड़ा अंतर सामने आया है। राज्य सरकार के अनुसार, कुछ मामलों में यह अंतर खरीद लागत का 52 गुना से भी अधिक रहा।

कर्नाटक के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री यूटी खाडर ने इस मुद्दे को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) के सामने उठाया है। राज्य सरकार का कहना है कि कुछ दवाएं अस्पतालों को भारी संस्थागत छूट के साथ उपलब्ध कराई जाती हैं, लेकिन मरीजों से बिलिंग के दौरान उनसे MRP के करीब कीमत वसूली जाती है। सरकार ने ऐसी कीमतों में पारदर्शिता और आवश्यक दवाओं पर व्यापार मार्जिन को नियंत्रित करने की मांग की है।

253 दवाओं में सामने आई कीमत संबंधी विसंगतियां

कर्नाटक FDA की जांच में 253 दवाओं और अन्य उत्पादों में अत्यधिक मूल्य अंतर की पहचान की गई। रिपोर्ट में कुछ उदाहरणों में खरीद कीमत और MRP के बीच कई गुना का अंतर दर्ज किया गया। इनमें Gufipol की लैंडिंग कॉस्ट 86 रुपये बताई गई, जबकि उसका MRP 4,528 रुपये था। इसी तरह Guficycline-50 Injection की खरीद कीमत 160 रुपये और MRP 7,110 रुपये दर्ज किया गया।

कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ महंगी दवाओं में भी बड़ा अंतर सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, Taxocare 120 mg की खरीद कीमत करीब 1,000 रुपये थी, जबकि MRP 21,617 रुपये दर्ज किया गया। Canmab 440 mg के लिए लैंडिंग कॉस्ट 6,600 रुपये और MRP 57,457 रुपये बताया गया। हालांकि, ये आंकड़े राज्य सरकार द्वारा किए गए निरीक्षण में सामने आए मामलों से जुड़े हैं और अलग-अलग अस्पतालों या आपूर्ति श्रृंखलाओं में वास्तविक बिक्री कीमत अलग हो सकती है।

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Karnataka FDA: मेडिकल कंज्यूमेबल्स में भी बड़ा अंतर

जांच केवल दवाओं तक सीमित नहीं रही। अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले कुछ मेडिकल कंज्यूमेबल्स की खरीद लागत और MRP में भी काफी अंतर पाया गया। उदाहरण के तौर पर, एक एडल्ट नेबुलाइजर मास्क की खरीद कीमत 44.50 रुपये बताई गई, जबकि उसका MRP 950 रुपये था। इसी तरह एक IV सेट की खरीद कीमत 14.75 रुपये और MRP 295 रुपये दर्ज किया गया।

राज्य सरकार के मुताबिक, ऐसे मूल्य अंतर का असर खासतौर पर लंबे समय तक इलाज कराने वाले मरीजों पर पड़ सकता है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों में उपचार के दौरान महंगी दवाओं और मेडिकल सामग्री की आवश्यकता होने के कारण अस्पताल के बिल में इनकी कीमत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

केंद्र से कई बदलावों की मांग

कर्नाटक सरकार ने केंद्र से संस्थागत कीमतों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए मरीजों के बिल में लैंडिंग कॉस्ट और MRP दोनों दर्शाने की व्यवस्था पर विचार करने का आग्रह किया है। इसके अलावा आवश्यक और महंगी दवाओं के व्यापार मार्जिन को नियंत्रित करने, दवा मूल्य नियंत्रण व्यवस्था के दायरे का विस्तार करने और राष्ट्रीय स्तर पर संस्थागत खरीद तथा मरीजों से होने वाली बिलिंग का अध्ययन कराने की मांग भी की गई है।

राज्य ने एक अंतर-मंत्रालयी विशेषज्ञ समूह गठित करने और कीमतों की निगरानी के लिए ऑडिट एवं प्रवर्तन व्यवस्था विकसित करने का प्रस्ताव भी रखा है। कर्नाटक FDA ने बताया कि 25 और 26 सितंबर को बेंगलुरु समेत राज्य के विभिन्न हिस्सों में दोबारा विशेष सत्यापन अभियान चलाया गया। इस चरण में 768 से अधिक कंज्यूमेबल आइटम और 189 महंगी दवाओं की जांच की गई।

Karnataka FDA: दवाओं की कीमतों पर पहले भी उठ चुके हैं सवाल

महंगी कैंसर दवाओं की कीमतों को लेकर हाल में सुप्रीम कोर्ट में भी चर्चा हुई थी। सितंबर 2026 में अदालत के सामने एक कैंसर दवा के रिटेलर मूल्य और MRP के बीच करीब दस गुना अंतर का उदाहरण आया था। वहीं, केंद्र सरकार ने मार्च 2026 में बताया था कि DPCO 2013 के तहत निर्धारित दवाओं की कीमतों पर NPPA की ओर से नियंत्रण किया जाता है और 9 मार्च 2026 तक 131 एंटी-कैंसर दवाओं के सीलिंग प्राइस प्रभावी थे।

कर्नाटक सरकार की ताजा पहल के बाद अब महंगी दवाओं की संस्थागत खरीद, MRP और मरीजों से होने वाली वास्तविक बिलिंग के बीच अंतर को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर आगे की कार्रवाई पर नजर रहेगी।

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