Shubhendu Adhikar (कोलकाता):- पश्चिम बंगाल में धर्म, परंपरा और खान-पान को लेकर सियासत एक बार फिर गरमा गई है। कालीघाट स्थित मां काली मंदिर में भाजपा नेता और विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी का मछली का प्रसाद ग्रहण करना चर्चा का विषय बन गया है। मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद शुभेंदु अधिकारी फ्राइड फिश और पीले चावल खाते नजर आए। अब सवाल उठ रहा है कि यह महज धार्मिक परंपरा थी या इसके जरिए बंगाल की राजनीति में कोई संदेश देने की कोशिश भी की गई?
Shubhendu Adhikari: बागेश्वर बाबा के बयान के बाद क्यों बढ़ी चर्चा?
शुभेंदु अधिकारी का यह वीडियो और तस्वीरें ऐसे समय सामने आई हैं, जब बंगाल में मांसाहारी भोजन को लेकर बहस पहले से चल रही है। बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान लोगों से मछली और मांस से परहेज करने की अपील की थी। उनके इस बयान पर बंगाल में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं और इसे बंगाली खान-पान तथा स्थानीय संस्कृति से जोड़कर देखा गया।
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इसी विवाद के बीच शुभेंदु अधिकारी का कालीघाट मंदिर में मछली का प्रसाद खाना राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सवाल यह भी है कि क्या भाजपा नेता ने अपने इस कदम के जरिए बंगाल की स्थानीय परंपराओं के पक्ष में संदेश देने की कोशिश की है?
Shubhendu Adhikari: धार्मिक परंपरा या सियासी रणनीति?
कालीघाट मंदिर में मछली का भोग बंगाल की धार्मिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। इसलिए शुभेंदु अधिकारी के मछली का प्रसाद लेने को केवल राजनीतिक बयान के तौर पर देखना भी सही नहीं होगा। लेकिन राजनीति में समय और परिस्थितियां किसी भी तस्वीर या बयान का अर्थ बदल सकती हैं।
जब एक तरफ धार्मिक मंच से बंगाल में मांसाहारी भोजन को लेकर अपील की जा रही हो और दूसरी तरफ भाजपा के वरिष्ठ नेता उसी दौरान कालीघाट मंदिर में मछली का प्रसाद लेते दिखाई दें, तो राजनीतिक संदेश की चर्चा होना स्वाभाविक है।
Shubhendu Adhikari: बंगाल की संस्कृति पर किसका दावा?
बंगाल की राजनीति में संस्कृति और पहचान हमेशा से बड़े मुद्दे रहे हैं। मछली यहां केवल भोजन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा भी मानी जाती है। ऐसे में मछली खाने को लेकर किसी तरह की अपील या आपत्ति सीधे तौर पर लोगों की व्यक्तिगत पसंद और स्थानीय परंपराओं से जुड़ जाती है।
शुभेंदु अधिकारी के इस कदम को उनके समर्थक बंगाली संस्कृति और धार्मिक परंपरा के समर्थन के रूप में देख सकते हैं, जबकि विरोधी इसे सियासी स्टंट या विवाद का फायदा उठाने की कोशिश बता सकते हैं।
हालांकि, शुभेंदु अधिकारी ने मंदिर में मछली का प्रसाद ग्रहण करते समय इसे किसी राजनीतिक अभियान के रूप में पेश नहीं किया है। इसलिए इसके पीछे किसी निश्चित राजनीतिक रणनीति का दावा करना जल्दबाजी होगी। इतना जरूर है कि बागेश्वर बाबा के बयान के बीच कालीघाट मंदिर में मछली का प्रसाद लेने की तस्वीर ने बंगाल की सियासत को एक नया मुद्दा जरूर दे दिया है। अब देखना होगा कि यह विवाद आने वाले दिनों में कितना बड़ा राजनीतिक रंग लेता है।