SIR विवाद (नई दिल्ली): चुनाव आयोग में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सामने आए हालिया मतभेदों ने एक बार फिर आयोग के भीतर असहमति के पुराने मामलों की चर्चा तेज कर दी है। भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसका गठन 25 जनवरी 1950 को हुआ था। वर्तमान में आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, बहुसदस्यीय आयोग में सभी आयुक्तों की निर्णय प्रक्रिया में समान भूमिका होती है और जरूरत पड़ने पर फैसला बहुमत के आधार पर लिया जाता है।
हालिया विवाद में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के बीच SIR से जुड़े मुद्दों पर मतभेद की खबरें सामने आई हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची, नाम जोड़ने-हटाने और आयोग के आईटी सिस्टम से जुड़े कुछ मामलों पर आपत्तियां दर्ज की थीं। हालांकि, चुनाव आयोग के सूत्रों ने इन रिपोर्टों के बीच कहा है कि SIR समेत आयोग के सभी फैसले दोनों चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
अशोक लवासा की असहमति भी रही चर्चा में
चुनाव आयोग में सार्वजनिक रूप से सामने आई असहमति का एक चर्चित उदाहरण 2019 के लोकसभा चुनाव से जुड़ा है। तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से जुड़े आदर्श आचार संहिता के मामलों में आयोग के बहुमत के फैसलों से अलग राय रखी थी। उन्होंने अपनी असहमति को अंतिम आदेशों में दर्ज करने की मांग की थी, लेकिन तत्कालीन आयोग ने इसे स्वीकार नहीं किया। बाद में लवासा ने कुछ आचार संहिता संबंधी बैठकों से खुद को अलग कर लिया था।
SIR विवाद: एन. गोपालस्वामी और नवीन चावला का मामला
साल 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को भेजी थी। यह चुनाव आयोग के इतिहास में असाधारण घटनाओं में से एक माना गया। इस प्रकरण ने आयोग के भीतर मतभेद और मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों की भूमिका को लेकर व्यापक बहस को जन्म दिया।
टीएन शेषन और बहुसदस्यीय आयोग
1990 के दशक में टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे। 1993 में दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए और आयोग का स्वरूप बहुसदस्यीय हो गया। शेषन ने इस व्यवस्था को चुनौती दी थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बहुसदस्यीय आयोग की व्यवस्था कायम रही और निर्णय प्रक्रिया में सभी सदस्यों की भूमिका स्पष्ट हुई। ECI के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक 1993 से बहुसदस्यीय आयोग की व्यवस्था लगातार लागू है और निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं।
इस तरह चुनाव आयोग के इतिहास में असहमति कोई नई घटना नहीं है। हालांकि, हर मामले की परिस्थितियां अलग रही हैं। मौजूदा SIR विवाद में भी एक ओर आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर रिपोर्टें सामने आई हैं, जबकि दूसरी ओर चुनाव आयोग की ओर से निर्णयों को सर्वसम्मति से लिया गया बताया गया है। ऐसे में हालिया घटनाक्रम ने आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया, पारदर्शिता और असहमति दर्ज करने की व्यवस्था को फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है।