नई दिल्ली। झारखंड राज्यसभा चुनाव और कर्नाटक विधान परिषद (एमएलसी) चुनाव में हुई क्रॉस वोटिंग ने देश की दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों—भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस—को असहज स्थिति में ला खड़ा किया है। दिलचस्प बात यह है कि जिस क्रॉस वोटिंग को एक राज्य में लोकतांत्रिक विवेक और समर्थन बताया जा रहा है, दूसरे राज्य में उसी घटना को विश्वासघात और अनुशासनहीनता करार दिया जा रहा है।
झारखंड में राज्यसभा चुनाव के दौरान हुई क्रॉस वोटिंग का फायदा भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को मिला। कांग्रेस ने अपनी हार के लिए सहयोगी दलों और विधायकों की क्रॉस वोटिंग को जिम्मेदार ठहराया, जिसके बाद महागठबंधन के भीतर तनाव की स्थिति पैदा हो गई।
वहीं कर्नाटक में विधान परिषद चुनाव के दौरान कथित तौर पर भाजपा और जेडीएस खेमे के कुछ वोट कांग्रेस उम्मीदवारों के पक्ष में चले गए। परिणामस्वरूप कांग्रेस ने सात में से पांच सीटों पर जीत दर्ज की। इस घटनाक्रम के बाद भाजपा नेतृत्व ने राज्य इकाई से जवाब-तलब किया और पार्टी के शीर्ष नेताओं को दिल्ली तलब किया गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दोनों राज्यों के घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राजनीतिक दल क्रॉस वोटिंग को केवल अपने लाभ और नुकसान के आधार पर परिभाषित करते हैं। जब परिणाम अनुकूल हों तो इसे अंतरात्मा की आवाज कहा जाता है, जबकि प्रतिकूल होने पर इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया जाता है।
झारखंड और कर्नाटक के हालिया चुनावी नतीजों ने न केवल दलों के भीतर मौजूद असंतोष और गुटबाजी को उजागर किया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि भारतीय राजनीति में सिद्धांतों से अधिक राजनीतिक हित अक्सर बयानबाजी की दिशा तय करते हैं। क्रॉस वोटिंग का यह विवाद आने वाले समय में दलों की आंतरिक एकजुटता और राजनीतिक नैतिकता पर बहस को और तेज कर सकता है।