Saudi Houthi Conflict: सऊदी अरब पर यमन के हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों के बीच पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को लेकर चर्चा तेज हो गई है। समझौते में तीनों देशों ने सामूहिक सुरक्षा और रक्षा सहयोग की प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन पाकिस्तान की ओर से सीधे सैन्य अभियान में शामिल होने को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट निर्णय सामने नहीं आया है।
हाल के दिनों में सऊदी अरब को हूती हमलों का सामना करना पड़ा है। 19 सितंबर को सऊदी अधिकारियों ने बताया था कि हूतियों की ओर से रियाद को निशाना बनाने वाली बैलिस्टिक मिसाइल को रोक दिया गया। इससे पहले सऊदी क्षेत्र में ड्रोन और मिसाइल हमलों की कई घटनाएं सामने आई थीं।
मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को लेकर पाकिस्तान के रुख में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस समझौते को अभी पूरी तरह परिचालन रूप देने की प्रक्रिया चल रही है। पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने सितंबर में कहा था कि समझौते के तहत संस्थागत तंत्र और आगे की व्यवस्थाएं विकसित करने में समय लगेगा। साथ ही, इस्लामाबाद ने यह भी स्पष्ट किया था कि उस समय हूती ठिकानों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई पर कोई चर्चा नहीं हो रही थी।
Saudi Houthi Conflict: इसी वजह से पाकिस्तान की कथित ‘चुप्पी’ को सीधे तौर पर समझौते से पीछे हटने के रूप में देखना अभी उचित नहीं होगा। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने 25 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा में सऊदी अरब के प्रति पूर्ण एकजुटता जताई और हूती हमलों की निंदा की। उन्होंने कहा कि मक्का संयुक्त रक्षा समझौता किसी एक देश के खिलाफ नहीं, बल्कि क्षेत्रीय रक्षा, स्थिरता और शांति के लिए है।
इससे पहले तुर्किये ने भी सऊदी अरब की सैन्य जरूरतों में तकनीकी सहायता देने की तत्परता जताई थी। तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने कहा था कि यदि सऊदी अरब को समझौते के तहत किसी तकनीकी सैन्य सहायता की जरूरत होती है तो उनका देश मदद के लिए तैयार है।
Saudi Houthi Conflict: 22 सितंबर को तुर्किये, पाकिस्तान, सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्रियों ने भी एक संयुक्त बयान में सऊदी अरब के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन किया और क्षेत्र में सुरक्षित नौवहन की जरूरत पर जोर दिया। साथ ही, उन्होंने क्षेत्रीय संकटों के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति को महत्वपूर्ण बताया।
इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि मक्का रक्षा समझौते की वास्तविक सैन्य उपयोगिता का परीक्षण अभी सीधे तौर पर नहीं हुआ है। समझौते के तहत किस परिस्थिति में किस तरह की सैन्य या तकनीकी सहायता दी जाएगी, इसे लेकर आगे की संस्थागत व्यवस्था महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल पाकिस्तान ने सऊदी अरब के समर्थन, उसकी संप्रभुता की रक्षा और क्षेत्र में कूटनीतिक प्रयासों पर जोर दिया है।