Chhattisgarh High Court: क्या बेगुनाह फंस रहे थे रिश्वत के केस में? HC ने क्यों बदला नियम?

Chhattisgarh High Court (बिलासपुर):-  छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर एक बेहद अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत किसी सरकारी कर्मचारी के पास से सिर्फ रिश्वत के नोट बरामद हो जाना ही उसे गुनहगार साबित करने के लिए काफी नहीं है।

 

हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपी को दोषी ठहराने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि उसने रिश्वत की मांग की थी। अगर अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहता है कि रिश्वत मांगी गई थी, तो सिर्फ पैसे की बरामदगी के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।

Chhattisgarh High Court: क्या था पूरा मामला?

यह मामला रायपुर के एक सरकारी कर्मचारी से जुड़ा था, जिस पर रिश्वत लेने का आरोप था। ट्रैप कार्रवाई के दौरान उसके पास से रिश्वत की रकम बरामद की गई थी। निचली अदालत ने बरामदगी को ही आधार बनाकर उसे दोषी करार दे दिया था।

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इसके खिलाफ आरोपी ने हाई कोर्ट में अपील की। आरोपी के वकील ने दलील दी कि उसके मुवक्किल ने कभी रिश्वत की मांग ही नहीं की थी और उसे झूठे केस में फंसाया गया है।

Chhattisgarh High Court: कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार के केस में दो चीजें साबित करना सबसे जरूरी है –

1. रिश्वत की मांग (Demand): आरोपी ने रिश्वत मांगी थी।
2. स्वीकृति (Acceptance): उसने उसे स्वीकार किया।

कोर्ट ने कहा कि अगर सिर्फ स्वीकृति या बरामदगी साबित होती है और मांग साबित नहीं होती, तो यह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जाएगा। अदालत ने कहा, “कई बार लोग बिना मांगे ही पैसे रख देते हैं या फंसा देते हैं। इसलिए मांग का साबित होना बेहद जरूरी है।

Chhattisgarh High Court: आम लोगों और कर्मचारियों पर क्या असर होगा?

हाई कोर्ट के इस फैसले को कानूनी जानकार बहुत महत्वपूर्ण मान रहे हैं। इस फैसले के बाद अब एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) और CBI के लिए भ्रष्टाचार के मामलों में सिर्फ ट्रैप करके नोट बरामद करना काफी नहीं होगा। उन्हें ऑडियो, वीडियो या गवाहों के जरिए यह भी साबित करना होगा कि आरोपी ने रिश्वत की मांग की थी।

वहीं, सरकारी कर्मचारियों के लिए यह फैसला एक तरह से राहत भरा भी है। कई बार देखा गया है कि रंजिश या अन्य कारणों से लोगों को रिश्वत के झूठे मामलों में फंसा दिया जाता है। अब ऐसे मामलों में बेगुनाहों को बचने का मौका मिलेगा।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि अगर मांग और स्वीकृति दोनों साबित हो जाते हैं, तो आरोपी को सख्त सजा मिलेगी। भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति जारी रहेगी, लेकिन किसी बेगुनाह को सिर्फ शक के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।

इस फैसले के बाद अब छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच और ट्रायल का तरीका बदल सकता है।

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