स्वामी श्रद्धानंद महाराज:- गुरु पूर्णिमा पर सरकारी अवकाश घोषित हो — स्वामी श्रद्धानंद महाराज की भारत सरकार से अपील

स्वामी श्रद्धानंद महाराज (पटना, बिहार):- गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्री परमहंस आश्रम, रानीसराय (बख्तियारपुर, पटना) में प्रवासरत परम पूज्य स्वामी श्रद्धानंद महाराज जी ने देशवासियों को गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएँ देते हुए विश्वगुरु स्वामी अड़गड़ानंद महाराज जी के श्रीचरणों में सभी भक्तों के लिए मंगलकामना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि गुरु महाराज की कृपा से प्रत्येक साधक के जीवन में भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति हो, यही हमारी प्रार्थना है।

 

स्वामी श्रद्धानंद महाराज ने अपने संदेश में कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि गुरु और शिष्य के प्रेम, विश्वास, समर्पण तथा आत्मिक संबंध का महापर्व है। इस दिन शिष्य अपने गुरु के समक्ष उपस्थित होकर अपने जीवन की भौतिक एवं आध्यात्मिक समस्याओं का निवेदन करता है और सद्गुरु अपने अनुभव, उपदेश एवं साधना के मार्गदर्शन से उसके जीवन को नई दिशा प्रदान करते हैं।

स्वामी श्रद्धानंद महाराज

स्वामी श्रद्धानंद महाराज:- उन्होंने कहा कि ‘गु’ का अर्थ अंधकार और ‘रु’ का अर्थ प्रकाश है। जो मनुष्य को अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाए, वही वास्तविक गुरु है। गुरु केवल शास्त्रों का ज्ञाता नहीं, बल्कि स्वयं साधना के द्वारा अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे विकारों पर विजय प्राप्त कर चुका महापुरुष होता है।

 

स्वामी श्रद्धानंद महाराज ने वर्तमान समय में गुरु परंपरा पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज अनेक लोग केवल कथावाचन या धार्मिक आयोजनों के माध्यम से स्वयं को गुरु घोषित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि गुरु बनने का आधार प्रसिद्धि, भीड़ या मंच नहीं, बल्कि आत्मानुभूति और विकारों से पूर्ण मुक्त जीवन है। जो स्वयं माया, मोह और इंद्रिय विकारों से मुक्त नहीं हुआ, वह दूसरों को मुक्ति का मार्ग नहीं दिखा सकता।

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स्वामी श्रद्धानंद महाराज:- उन्होंने कहा कि भारत की सनातन गुरु-शिष्य परंपरा अत्यंत प्राचीन है। सामान्य धारणा है कि गुरु पूर्णिमा महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में मनाई जाती है। इसी दिन उन्होंने वेद, पुराण और महाभारत जैसे महान ग्रंथों के संकलन एवं रचना का कार्य पूर्ण किया, इसलिए यह दिवस ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहलाता है। किंतु गुरु परंपरा का इतिहास इससे भी अधिक प्राचीन है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यह सनातन योग अनेक ऋषि-मुनियों द्वारा पहले भी कहा गया है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत अनादि काल से ऋषि, गुरु और शिष्य की दिव्य परंपरा वाला राष्ट्र रहा है।

 

स्वामी श्रद्धानंद महाराज ने कहा कि 29 जुलाई को मनाई जाने वाली इस वर्ष की गुरु पूर्णिमा पर प्रत्येक शिष्य को अपने गुरु के समक्ष धन-संपत्ति से अधिक अपने भीतर के दोषों का समर्पण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिष्य के पास वास्तव में अपना कुछ भी नहीं है। जो कुछ है, वह सब ईश्वर का दिया हुआ है। इसलिए गुरु के चरणों में यदि कुछ अर्पित करना है तो अपने काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष और बुरे संस्कारों का त्याग करें। यही गुरु को सबसे प्रिय अर्पण है और यही वास्तविक गुरु दक्षिणा है।

 

स्वामी श्रद्धानंद महाराज:- उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि गुरु पूर्णिमा के दिन केवल पूजा-अर्चना तक सीमित न रहें, बल्कि अपने जीवन में सदाचार, सेवा, भक्ति, संयम और आध्यात्मिक साधना का संकल्प लें। यही गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

 

अपने संदेश के अंत में स्वामी श्रद्धानंद महाराज ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एवं भारत सरकार से विशेष अपील करते हुए कहा कि भारत गुरु-शिष्य परंपरा का विश्वविख्यात राष्ट्र है। ऐसे में आषाढ़ मास की गुरु पूर्णिमा पर पूरे देश में सरकारी अवकाश घोषित किया जाना चाहिए, ताकि प्रत्येक नागरिक अपने गुरु के प्रति श्रद्धा प्रकट कर सके और राष्ट्र की इस महान आध्यात्मिक परंपरा का सम्मान और अधिक बढ़े। उन्होंने कहा कि यदि भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत और सनातन गुरु परंपरा को विश्व के सामने गौरव के साथ प्रस्तुत करना चाहता है, तो गुरु पूर्णिमा को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष सम्मान मिलना चाहिए।

 

अंत में स्वामी श्रद्धानंद महाराज ने संत कबीरदास की वाणी का स्मरण कराते हुए कहा—

 

“सात समुद्र की मसि करूँ, लिखनी सब बनराय।

सब धरती कागज करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए॥”

 

उन्होंने कहा कि गुरु की महिमा शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती। गुरु ही वह दिव्य शक्ति हैं, जो मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान, अशांति से शांति और बंधन से मुक्ति की ओर ले जाते हैं। यही गुरु पूर्णिमा का वास्तविक संदेश है।

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