जेपी आंदोलन: लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने सत्ता नहीं बदलाव की राजनीति को चुना, ‘संपूर्ण क्रांति’ से देश में जगाई नई चेतना

जेपी आंदोलन: लोकनायक जयप्रकाश नारायण भारतीय राजनीति और सामाजिक आंदोलनों के ऐसे प्रमुख व्यक्तित्व रहे जिन्होंने व्यक्तिगत सत्ता और पद के बजाय सामाजिक बदलाव तथा लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राथमिकता दी। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर ‘संपूर्ण क्रांति’ तक उनका सार्वजनिक जीवन संघर्ष और जनभागीदारी से जुड़ा रहा। 11 अक्टूबर 1902 को बिहार के सिताबदियारा में जन्मे जयप्रकाश नारायण आगे चलकर देश में ‘लोकनायक’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

जयप्रकाश नारायण ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने भूमिगत रहकर आंदोलन को आगे बढ़ाने में योगदान दिया। अंग्रेजी शासन के खिलाफ उनके संघर्ष ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। आजादी के बाद भी उन्होंने राजनीति को केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं माना बल्कि समाज में व्यापक परिवर्तन को अपना लक्ष्य बनाया। उन्होंने विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से भी जुड़कर सामाजिक बदलाव के प्रयासों में भाग लिया।

जेपी आंदोलन: जेपी के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण चरण 1970 के दशक में सामने आया। उस समय देश में महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और शासन व्यवस्था को लेकर असंतोष बढ़ रहा था। गुजरात और बिहार में छात्र आंदोलनों के बीच जयप्रकाश नारायण ने सक्रिय भूमिका निभाई। 5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान से उन्होंने ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया। इसका उद्देश्य केवल सरकार बदलना नहीं बल्कि राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और नैतिक स्तर पर व्यापक परिवर्तन लाना था।

‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन धीरे-धीरे बिहार से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। जयप्रकाश नारायण ने भ्रष्टाचार और राजनीतिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया और युवाओं तथा आम नागरिकों की लोकतांत्रिक भागीदारी पर जोर दिया। आंदोलन ने तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती पेश की और आगे चलकर 1975 में लगाए गए आपातकाल के दौर में जेपी सहित कई विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया।

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जेपी आंदोलन:आपातकाल के बाद 1977 में विपक्षी दलों के एकजुट होने और जनता पार्टी के सत्ता में आने में जयप्रकाश नारायण की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाता है। यह केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन का दौर था। हालांकि जेपी स्वयं सत्ता के पद पर नहीं गए। यही उनके राजनीतिक जीवन की सबसे विशिष्ट बातों में से एक रही कि उन्होंने सत्ता प्राप्त करने के बजाय व्यवस्था और समाज में बदलाव को प्राथमिकता दी।

आज भी जयप्रकाश नारायण की विरासत भारतीय लोकतंत्र में जनभागीदारी, सामाजिक न्याय, जवाबदेही और शांतिपूर्ण राजनीतिक आंदोलन के संदर्भ में याद की जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके जन्मदिवस पर उन्हें लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के लिए समर्पित व्यक्तित्व बताते हुए ‘संपूर्ण क्रांति’ के उनके आह्वान को सामाजिक जागरण से जोड़ा था।

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