Kerala High Court (तिरुवनंतपुरम):- केरल हाई कोर्ट ने महंगी पेटेंट दवाओं को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई पेटेंट वाली दवा बहुत ज्यादा महंगी कीमत पर बेची जा रही है, तो केंद्र सरकार पेटेंट अधिनियम की धारा 100 के तहत दखल दे सकती है और उस दवा का निर्माण खुद करा सकती है।
जस्टिस हरिशंकर वी. मेनन की एकल पीठ ने कहा कि जब जीवन रक्षक दवाएं आम मरीजों की पहुंच से बाहर हो जाएं, तो सरकार हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकती। सरकार को अपनी शक्तियों को सीमित नहीं करना चाहिए। धारा 100 की उप-धारा (4) और (6) सरकार को यह अधिकार देती है कि वह किसी भी व्यक्ति या संस्था को गैर-व्यावसायिक आधार पर पेटेंट दवाओं के निर्माण और बिक्री के लिए अधिकृत कर सकती है।
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Kerala High Court: क्या है पूरा मामला?
यह मामला स्तन कैंसर की पेटेंट दवा राइबोसिक्लिब की कीमत से जुड़ा था। इस दवा के 21 दिनों के एक कोर्स का खर्च 58,000 रुपये से अधिक है और साल भर का खर्च करीब 7.9 लाख रुपये तक बैठता है। यह याचिका वर्ष 2022 में एक कैंसर पीड़िता द्वारा दायर की गई थी। जनवरी 2023 से 57 बार सूचीबद्ध होने के बावजूद इस केस पर अंतिम सुनवाई नहीं हो पाई और इस दौरान याचिकाकर्ता की मौत हो गई। इसके बाद कोर्ट ने जनहित में इस मामले पर सुनवाई जारी रखी।
मरीजों और सामाजिक संगठनों के वर्किंग ग्रुप ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर सुनवाई तेज करने की मांग की थी। समूह ने दलील दी थी कि पेटेंट के कारण राइबोसिक्लिब का मासिक खर्च 78,400 रुपये से अधिक और एबेमासिक्लिब का खर्च 47,700 से 95,500 रुपये तक है। अगर धारा 100 के तहत सरकारी लाइसेंस मिलता है तो जेनेरिक दवाएं 90 से 95 फीसदी तक सस्ती हो सकती हैं।
Kerala High Court: केंद्र और फार्मा कंपनियों की दलील खारिज
केंद्र सरकार और दवा कंपनियों ने तर्क दिया था कि धारा 100 केवल प्रत्यक्ष सरकारी उपयोग तक ही सीमित है। अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने यह भी माना कि राइबोसिक्लिब और पैल्बोसिक्लिब दोनों अलग-अलग दवाएं हैं और एक-दूसरे की जगह नहीं ले सकतीं।
अपने फैसले के अंत में हाई कोर्ट ने एमटी वासुदेवन नायर की प्रसिद्ध फिल्म ‘सुकृतम’ का जिक्र किया, जिसमें कैंसर मरीजों के इलाज के खर्च के संघर्ष को दिखाया गया था। कोर्ट ने अफसोस जताया कि तीन दशक बाद भी हालात में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है।