नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों द्वारा सीधे भाजपा में शामिल होने के बजाय त्रिपुरा की अपेक्षाकृत कम चर्चित नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय करने का फैसला भारतीय राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है। राजनीतिक जानकार इसे एक सोची-समझी कानूनी और संसदीय रणनीति मान रहे हैं।
दरअसल, यदि सांसद सीधे किसी दूसरी पार्टी में शामिल होते, तो उन पर दल-बदल कानून (Anti-Defection Law) के तहत कार्रवाई का खतरा पैदा हो सकता था। ऐसे में बागी सांसदों ने पहले NCPI में विलय का रास्ता चुना और लोकसभा अध्यक्ष से संसद में अलग पहचान एवं अलग बैठने की मांग की। रिपोर्टों के अनुसार, बागी गुट का दावा है कि उनके साथ TMC के दो-तिहाई सांसद हैं, जो विलय संबंधी कानूनी प्रावधानों के लिए महत्वपूर्ण संख्या मानी जाती है।
बागी सांसदों की नेता काकोली घोष दस्तीदार ने कहा है कि 20 सांसदों ने NCPI के साथ जाने का फैसला किया है और वे आगे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का समर्थन करेंगे। इस कदम के बाद NCPI अचानक राष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण नाम बनकर उभरी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि NCPI इस पूरे घटनाक्रम में एक “राजनीतिक पुल” की भूमिका निभा रही है। इससे बागी सांसद तत्काल कानूनी चुनौतियों से बचते हुए अपनी संसदीय स्थिति बनाए रख सकते हैं और साथ ही NDA के करीब भी रह सकते हैं।
हालांकि TMC नेतृत्व ने इस कदम का विरोध किया है और लोकसभा अध्यक्ष से बागी गुट को अलग मान्यता नहीं देने की मांग की है। आने वाले दिनों में इस मामले का कानूनी और राजनीतिक असर पश्चिम बंगाल की राजनीति के साथ-साथ संसद के शक्ति संतुलन पर भी पड़ सकता है।